सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: वकीलों पर कार्रवाई के हाईकोर्ट आदेश पर अंतरिम रोक
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस चर्चित आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसमें दो वकीलों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू करने का निर्देश दिया गया था। इन वकीलों पर आरोप है कि उन्होंने…
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस चर्चित आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसमें दो वकीलों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू करने का निर्देश दिया गया था। इन वकीलों पर आरोप है कि उन्होंने ज़मीन अधिग्रहण से जुड़े एक मामले में दस्तावेज़ों में हेरफेर कर अपने मुवक्किलों के लिए राहत हासिल की थी। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, शीर्ष अदालत ने वकील शिव कांत मिश्रा की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया।
मामले की सुनवाई जस्टिस पी.के. मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की बेंच ने की। बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के 30 जुलाई के आदेश को चुनौती देने वाली विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) पर नोटिस जारी किया है और अगली सुनवाई के लिए 12 अक्टूबर की तारीख तय की है। तब तक के लिए हाईकोर्ट के आदेश के अमल पर रोक रहेगी।
क्या था इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश?
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने रजिस्ट्रार जनरल को वकील शिव कांत मिश्रा और कृष्ण कांत मिश्रा के खिलाफ सीआरपीसी की धारा 340 के तहत कार्यवाही शुरू करने का निर्देश दिया था। हाईकोर्ट ने माना था कि प्रथम दृष्टया उनका आचरण आईपीसी की धारा 199 के तहत अपराध है, जिसमें झूठी गवाही के लिए सज़ा का प्रावधान है। इसके अलावा, हाईकोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया और स्टेट बार काउंसिल में शिकायत दर्ज कर दोनों वकीलों के लाइसेंस रद्द करने की भी सिफारिश की थी।
धोखाधड़ी और जाली दस्तावेज़ का आरोप
यह पूरा विवाद बरेली विकास प्राधिकरण द्वारा अधिग्रहित भूमि के मुआवज़े पर ब्याज़ के भुगतान से जुड़ा है। प्राधिकरण की एक समीक्षा याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने पाया था कि 26 अप्रैल, 2016 के एक अवार्ड की टाइप्ड कॉपी में एक अतिरिक्त पैरा जोड़ा गया था। इस जोड़े गए हिस्से में पहले साल 9% और उसके बाद 15% सालाना ब्याज़ का प्रावधान था, जो मूल अवार्ड में मौजूद नहीं था।
इसी टाइप्ड कॉपी के आधार पर एक अन्य बेंच ने 24 मई, 2024 को प्राधिकरण को ब्याज़ चुकाने का आदेश दे दिया था। जब प्राधिकरण को इस कथित धोखाधड़ी का पता चला तो उसने समीक्षा याचिका दायर की। हाईकोर्ट ने वकीलों की इस दलील को खारिज कर दिया था कि यह सिर्फ एक 'टाइपिंग की गलती' थी। कोर्ट ने इसे 'धोखाधड़ी का कृत्य' करार देते हुए कहा था कि वकीलों ने जानबूझकर अपने मुवक्किलों को आर्थिक लाभ पहुँचाने के लिए ऐसा किया।
हाईकोर्ट ने धोखाधड़ी से हासिल किए गए 24 मई, 2024 के अपने पिछले आदेश को रद्द करते हुए बरेली विकास प्राधिकरण को लाभार्थियों से अतिरिक्त भुगतान की वसूली की प्रक्रिया शुरू करने का भी निर्देश दिया था। सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा आदेश से अब इन सभी कार्यवाहियों पर फिलहाल रोक लग गई है।
इनपुट: IANS



