शनिवार, 1 अगस्त 2026 · नई दिल्ली
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‘समुद्र मंथन’ योजना: 84,000 करोड़ रुपए से भारत अपने तेल-गैस आयात पर निर्भरता कैसे घटाएगा?

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के आयात पर बहुत अधिक निर्भर है, जिस पर सालाना लगभग 13 लाख करोड़ रुपए (144 अरब डॉलर) खर्च होते हैं। इसी निर्भरता को कम करने और देश की ऊर्जा…

‘समुद्र मंथन’ योजना: 84,000 करोड़ रुपए से भारत अपने तेल-गैस आयात पर निर्भरता कैसे घटाएगा?
(फोटो: IANS)

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के आयात पर बहुत अधिक निर्भर है, जिस पर सालाना लगभग 13 लाख करोड़ रुपए (144 अरब डॉलर) खर्च होते हैं। इसी निर्भरता को कम करने और देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए केंद्र सरकार ने ‘समुद्र मंथन’ नाम से एक महत्वाकांक्षी योजना को मंजूरी दी है। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय का मानना है कि यह योजना भारत को आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से आगे बढ़ाएगी।

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शुक्रवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा स्वीकृत यह योजना, भारत का अब तक का सबसे बड़ा अपतटीय (ऑफशोर) तेल एवं गैस खोज मिशन है। सरकार ने इसके लिए वित्त वर्ष 2030-31 तक 84,084 करोड़ रुपए का प्रावधान किया है। इसका मुख्य उद्देश्य गहरे समुद्र (डीपवॉटर) में तेल और गैस की खोज और उत्पादन के लिए एक मजबूत इकोसिस्टम तैयार करना है।

योजना का लक्ष्य और महत्व

मंत्रालय के मुताबिक, भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल उपभोक्ता है और आने वाले वर्षों में उसकी ऊर्जा मांग लगातार बढ़ने की उम्मीद है। हाल के वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाक्रमों ने यह साफ कर दिया है कि एक तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए ऊर्जा संसाधनों की निर्बाध उपलब्धता कितनी महत्वपूर्ण है। ‘समुद्र मंथन’ योजना इसी दिशा में एक बड़ा कदम है, जो घरेलू उत्पादन बढ़ाकर आयात पर निर्भरता कम करेगी और देश की आर्थिक वृद्धि को सुनिश्चित करेगी।

यह योजना बेहतर भू-वैज्ञानिक डेटा, जोखिम साझा करने की व्यवस्था, साझा बुनियादी ढांचे और घरेलू विनिर्माण क्षमताओं पर ध्यान केंद्रित करेगी। मंत्रालय ने इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले कुछ वर्षों में किए गए व्यापक सुधारों का अगला चरण बताया है, जिसका उद्देश्य नीतिगत सुधारों को ज़मीनी स्तर पर उतारना है।

ऊर्जा क्षेत्र में हुए बड़े सुधार

सरकार ने 2014 के बाद से हाइड्रोकार्बन अन्वेषण और उत्पादन के क्षेत्र में कई संरचनात्मक सुधार किए हैं। इनमें सबसे अहम 99 प्रतिशत से अधिक ‘नो-गो’ क्षेत्रों को खोलना है, जिससे भारत के विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र में 10 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक इलाके में तेल-गैस की खोज का रास्ता साफ हुआ है।

नीतिगत बदलाव:

  • राजस्व साझाकरण: पुरानी प्रोडक्शन शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट (PSC) व्यवस्था को बदलकर रेवेन्यू शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट (RSC) लागू किया गया है, जिससे कर और राजस्व का ढांचा सरल और पारदर्शी बना है।
  • आधुनिक कानून: ऑयलफील्ड्स (रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट) संशोधन अधिनियम, 2025 के जरिए कानूनी ढांचे को आधुनिक बनाया गया है, जिसमें अनुबंधों की स्थिरता और विवाद निपटान पर जोर दिया गया है।
  • सरल प्रक्रियाएं: पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस नियम, 2025 का लक्ष्य नियामकीय प्रक्रियाओं को प्रभावी बनाकर कारोबार करने में आसानी बढ़ाना है।
  • समान अवसर: सभी कंपनियों को समान अवसर देने के लिए सशक्त सचिव समिति की संरचना और अधिकारों को सभी अनुबंधों के लिए एक जैसा कर दिया गया है।

इसके अलावा, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों ONGC और ऑयल इंडिया के प्रदर्शन मानकों में भी बदलाव किया गया है। अब उनके मूल्यांकन में तेल और गैस की खोज गतिविधियों को अधिक महत्व दिया जाएगा, ताकि घरेलू संसाधनों के विकास को गति मिल सके।

इनपुट: IANS

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