राजस्थान: ₹306 करोड़ की पर्यटन योजनाओं से बदलेगी जनजातीय क्षेत्रों की तस्वीर, महाराणा प्रताप सर्किट भी होगा विकसित
राजस्थान के जनजातीय क्षेत्रों को वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर स्थापित करने और स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार ने एक बड़ी पहल की है। 306 करोड़ रुपये से अधिक की लागत से, सरकार दो…
राजस्थान के जनजातीय क्षेत्रों को वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर स्थापित करने और स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार ने एक बड़ी पहल की है। 306 करोड़ रुपये से अधिक की लागत से, सरकार दो प्रमुख पर्यटन सर्किट विकसित कर रही है — जनजातीय पर्यटन सर्किट और महाराणा प्रताप पर्यटन सर्किट। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, इस महत्वाकांक्षी परियोजना का लक्ष्य न केवल पर्यटन को बढ़ावा देना है, बल्कि स्थानीय समुदायों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा करना और उनकी सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करना भी है।
अधिकारियों का मानना है कि यह पहल सिर्फ पर्यटन तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और जनजातीय समुदायों की आजीविका में सुधार लाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बनेगी। इस योजना से पर्यटकों की संख्या बढ़ने, उनके ठहराव की अवधि लंबी होने और स्थानीय कारीगरों व स्वयं सहायता समूहों को सीधा लाभ मिलने की उम्मीद है।
जनजातीय पर्यटन सर्किट: आस्था और प्रकृति का संगम
इस योजना के तहत, जनजातीय समुदाय के 'कुंभ' कहे जाने वाले डूंगरपुर स्थित बेणेश्वर धाम के विकास पर 49.40 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। वहीं, बांसवाड़ा के मानगढ़ धाम के लिए 13.41 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। इस सर्किट में चित्तौड़गढ़ के मातृकुंडिया (मेवाड़ का प्रयाग), प्रतापगढ़ का सीतामाता अभयारण्य, बांसवाड़ा का त्रिपुरा सुंदरी मंदिर, गौतमेश्वर महादेव मंदिर और उदयपुर का ऋषभदेव मंदिर जैसे कई महत्वपूर्ण स्थल भी शामिल होंगे।
महाराणा प्रताप पर्यटन सर्किट: इतिहास को सम्मान
राजस्थान की गौरवशाली विरासत को बढ़ावा देने के लिए, 206 करोड़ रुपये से अधिक की लागत से महाराणा प्रताप पर्यटन सर्किट का विकास प्रस्तावित है। यह सर्किट चावंड, हल्दीघाटी, गोगुंदा, कुंभलगढ़, दिवेर और उदयपुर जैसे ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण स्थानों को आपस में जोड़ेगा। इसके अलावा, गोगुंदा की बाईजी की बावड़ी और उदयपुर के करणी माता व नीमच माता मंदिर जैसे स्थलों का संरक्षण भी किया जाएगा।
सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण और प्रचार
सरकार जनजातीय संस्कृति को संरक्षित और प्रचारित करने के लिए भी कई कदम उठा रही है। 'सोंध माटी आदि धरोहर दस्तावेजीकरण योजना' के तहत पारंपरिक वाद्य यंत्रों, खानपान, चित्रकला और लोक कलाओं का दस्तावेजीकरण किया जा रहा है। साथ ही, 'बनफूल ट्राइबल डिजाइन स्टूडियो' और 'बनफूल' ब्रांडिंग के माध्यम से जनजातीय कलाकारों को बाजार से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। सरकार जनजातीय स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान पर डॉक्यूमेंट्री फिल्में भी तैयार करेगी, जिन्हें ऐतिहासिक स्थलों पर प्रदर्शित किया जाएगा।
इनपुट: IANS



