मुथंगा भूमि आंदोलन: सामाजिक कार्यकर्ता एम. गीतानंदन समेत चार दोषियों की सज़ा पर केरल हाईकोर्ट की अंतरिम रोक
केरल उच्च न्यायालय ने 2003 के मुथंगा भूमि आंदोलन से जुड़े हिंसा के एक मामले में सामाजिक कार्यकर्ता एम. गीतानंदन समेत चार लोगों को मिली सज़ा पर फिलहाल रोक लगा दी है। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार…
केरल उच्च न्यायालय ने 2003 के मुथंगा भूमि आंदोलन से जुड़े हिंसा के एक मामले में सामाजिक कार्यकर्ता एम. गीतानंदन समेत चार लोगों को मिली सज़ा पर फिलहाल रोक लगा दी है। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, जस्टिस ए. बदरुद्दीन की अदालत ने यह फैसला दोषियों द्वारा वायनाड सत्र न्यायालय के निर्णय के खिलाफ दायर याचिका पर दिया है। हालांकि, यह एक अंतरिम रोक है और अपील पर आगे विस्तृत सुनवाई की जाएगी।
अदालत ने चारों दोषियों को 36,000 रुपये जमा करने का आदेश भी दिया है। इससे पहले, उच्च न्यायालय ने मौखिक रूप से वायनाड सत्र न्यायालय के फैसले में दर्ज निष्कर्षों पर चिंता व्यक्त की थी और कहा था कि फैसले की समीक्षा की जानी चाहिए। हाईकोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि निचली अदालत के निष्कर्षों में खामियां स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही हैं।
क्या था निचली अदालत का फैसला?
वायनाड जिला प्रधान सत्र न्यायालय ने 31 जुलाई, 2024 को गीतानंदन, बीनू, रामेसन और अनिल कुमार समेत 57 लोगों के खिलाफ चल रहे मुकदमे में चार मुख्य आरोपियों को दोषी ठहराया था। इन पर गैर-कानूनी सभा, दंगा, सरकारी कर्मचारियों को गंभीर चोट पहुंचाने, धमकी, अपहरण और हत्या के प्रयास जैसे कई गंभीर आरोप लगाए गए थे। अदालत ने इन सभी को पांच साल के कठोर कारावास और 36,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया था कि आरोपियों ने एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी अब्दुल सलाम की हत्या और फॉरेस्ट रेंज ऑफिसर पी.के. ससिधरन के अपहरण का प्रयास किया था।
2003 का मुथंगा आदिवासी आंदोलन
यह पूरा मामला 19 फरवरी, 2003 को हुई मुथंगा हिंसा से जुड़ा है। आदिवासी कार्यकर्ता सी.के. जानू के नेतृत्व में 'गोत्र महासभा' के बैनर तले आदिवासियों ने भूमि अधिकारों की मांग को लेकर मुथांगा वन्यजीव अभयारण्य की जमीन पर कब्जा कर लिया था। जब पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हटाने की कार्रवाई शुरू की तो यह अभियान हिंसक हो गया। झड़पों के दौरान एक पुलिस कांस्टेबल के.वी. विनोद की मौत हो गई थी। पुलिस को कथित तौर पर 18 राउंड फायरिंग करनी पड़ी, जिसमें शुरुआत में दो प्रदर्शनकारियों की मौत हुई और बाद में यह संख्या और बढ़ गई। यह केरल के इतिहास के सबसे हिंसक जनजातीय संघर्षों में से एक माना जाता है।
इनपुट: IANS



