शनिवार, 19 सितम्बर 2026 · नई दिल्ली
राजनीति

यूपीआई लेनदेन पर शुल्क: शिवसेना (यूबीटी) का केंद्र पर हमला, विदेशी कंपनियों को फायदा पहुंचाने का आरोप

शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) गुट ने 2,000 रुपये से अधिक के कुछ यूपीआई लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने के फैसले पर केंद्र सरकार की तीखी आलोचना की है। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार…

यूपीआई लेनदेन पर शुल्क: शिवसेना (यूबीटी) का केंद्र पर हमला, विदेशी कंपनियों को फायदा पहुंचाने का आरोप
(फोटो: IANS)

शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) गुट ने 2,000 रुपये से अधिक के कुछ यूपीआई लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने के फैसले पर केंद्र सरकार की तीखी आलोचना की है। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, पार्टी ने अपने मुखपत्र 'सामना' में प्रकाशित एक संपादकीय में आरोप लगाया कि इस कदम से अंततः आम उपभोक्ताओं पर बोझ पड़ेगा और वीज़ा-मास्टरकार्ड जैसी वैश्विक भुगतान कंपनियों को लाभ होगा।

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शनिवार को प्रकाशित इस संपादकीय में 0.4 प्रतिशत शुल्क लगाने को "शब्दों का हेरफेर" करार दिया गया। सरकार के इस तर्क को खारिज करते हुए कि यह शुल्क केवल व्यापारियों पर लागू होगा, न कि सीधे ग्राहकों पर, पार्टी ने कहा कि इसका असर अंततः आम लोगों पर ही पड़ेगा।

शुल्क का बोझ और विदेशी कंपनियों को लाभ

संपादकीय में दावा किया गया कि जिस तरह ईंधन पर उत्पाद शुल्क और जीएसटी का बोझ अंततः ग्राहक उठाते हैं, उसी तरह व्यापारी भी इस लेनदेन शुल्क को ग्राहकों पर ही डालेंगे। पार्टी ने आरोप लगाया कि यह कदम भारतीय डिजिटल लेनदेन के बुनियादी ढांचे को वीज़ा और मास्टरकार्ड जैसी अमेरिकी वित्तीय कंपनियों को सौंपने जैसा है। इस शुल्क को भारत के मध्यम वर्ग और खुदरा व्यापारियों की कीमत पर अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने वाला एक अप्रत्यक्ष "उपहार" या जबरन वसूली बताया गया है।

विदेश नीति से जुड़े आरोप

ठाकरे गुट ने इस फैसले को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिकी दबाव के आगे झुकने की प्रवृत्ति से जोड़ा। संपादकीय में ईरान से तेल की खरीद रोकने और ट्रंप प्रशासन की राजनयिक मांगों को मानने जैसे उदाहरणों का हवाला देते हुए इसे विदेश नीति में एक और समझौता बताया गया। पार्टी ने कहा, "यूपीआई लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत शुल्क लगाने का निर्णय केवल अमेरिकी फिनटेक कंपनियों को खुश करने के लिए लिया गया था।"

'राष्ट्रीय सेवा का नया रूप' कह कर कसा तंज

संपादकीय में यह भी आरोप लगाया गया कि भारतीय नेताओं और उनके बच्चों को इन कंपनियों से हजारों करोड़ रुपये की दलाली मिलती है और यह जबरन वसूली में हिस्सेदारी जैसा है। इसे "राष्ट्रीय सेवा का नया रूप" बताते हुए तंज किया गया और कहा गया कि इसके लिए आम नागरिकों और छोटे खुदरा विक्रेताओं की बलि दी गई है। पार्टी ने सरकार के उन दावों की भी आलोचना की जिसमें सिंगापुर, यूएई, मॉरीशस और श्रीलंका जैसे देशों में यूपीआई को अपनाने का जश्न मनाया जाता है, जबकि घरेलू स्तर पर शुल्क लगाया जा रहा है। शिवसेना (यूबीटी) ने कहा कि सरकार कैशलेस अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने की आड़ में नोटबंदी, जीएसटी और महंगाई के बाद अब इस शुल्क के जरिए मध्यम और श्रमिक वर्ग का शोषण कर रही है।

इनपुट: IANS

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News4Social राजनीति डेस्क

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