सोमवार, 17 अगस्त 2026 · नई दिल्ली
स्वास्थ्य

आंध्र प्रदेश: स्टाइपेंड की मांग को लेकर डॉक्टरों की हड़ताल तेज़, सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित

आंध्र प्रदेश में सरकारी मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों की स्वास्थ्य सेवाएं सोमवार को उस समय गंभीर रूप से प्रभावित हो गईं, जब लगभग 9,000 जूनियर डॉक्टरों ने अपनी हड़ताल को और तेज़ कर दिया। समाचार एजेंसी…

आंध्र प्रदेश: स्टाइपेंड की मांग को लेकर डॉक्टरों की हड़ताल तेज़, सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित
(फोटो: IANS)

आंध्र प्रदेश में सरकारी मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों की स्वास्थ्य सेवाएं सोमवार को उस समय गंभीर रूप से प्रभावित हो गईं, जब लगभग 9,000 जूनियर डॉक्टरों ने अपनी हड़ताल को और तेज़ कर दिया। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, स्टाइपेंड में बढ़ोतरी की मांग को लेकर डॉक्टरों ने अब इमरजेंसी सेवाओं का भी पूरी तरह से बहिष्कार शुरू कर दिया है, जिससे गहन चिकित्सा इकाइयों (ICU), कैजुअल्टी वार्ड और लेबर रूम जैसे महत्वपूर्ण विभागों का कामकाज ठप पड़ गया है।

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आंध्र प्रदेश जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन (APJUDA) के आह्वान पर राज्य के सभी 19 सरकारी मेडिकल कॉलेजों के जूनियर डॉक्टर इस हड़ताल में शामिल हैं। इनमें रेजिडेंट डॉक्टर, मेडिकल इंटर्न, सुपर-स्पेशियलिटी पोस्ट-ग्रेजुएट और सीनियर रेजिडेंट समेत डिस्ट्रिक्ट रेजिडेंसी प्रोग्राम (DRP) के तहत तैनात डॉक्टर भी शामिल हैं। यह विरोध प्रदर्शन 11 अगस्त को गैर-आपातकालीन सेवाओं के बहिष्कार के साथ शुरू हुआ था, लेकिन सरकार से कोई लिखित आश्वासन न मिलने के बाद इसे और कड़ा कर दिया गया।

मांगें क्या हैं और सरकार का क्या कहना है?

डॉक्टरों की मुख्य मांग स्टाइपेंड में 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी है, जो 1 जनवरी से लंबित है। APJUDA के मुताबिक, 2009 के एक सरकारी आदेश में हर दो साल में स्टाइपेंड की समीक्षा का प्रावधान है। इसके जवाब में सरकार ने पोस्ट-ग्रेजुएट डॉक्टरों के लिए 3 प्रतिशत और हाउस सर्जनों व इंटर्न्स के लिए 5 प्रतिशत बढ़ोतरी का प्रस्ताव दिया है। सरकार ने अपनी आर्थिक स्थिति का हवाला देते हुए कहा है कि वित्त विभाग 15 प्रतिशत की वृद्धि के पक्ष में नहीं है।

इसके अलावा, एसोसिएशन नेशनल मेडिकल कमीशन के नियमों को लागू करने की भी मांग कर रहा है, जो क्लिनिकल फैकल्टी पदों पर एमएससी और पीएचडी डिग्री धारकों की भर्ती से संबंधित है। वे डॉक्टरों की सेवानिवृत्ति की आयु 62 से बढ़ाकर 65 वर्ष करने के प्रस्ताव का भी विरोध कर रहे हैं।

स्वास्थ्य सेवाओं पर असर और सरकारी तैयारी

हड़ताल के कारण सभी सरकारी टीचिंग अस्पतालों, सुपर-स्पेशियलिटी यूनिट्स और पेरिफेरल मेडिकल कॉलेजों में गैर-आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाएं पहले से ही पूरी तरह से बंद हैं। अब इमरजेंसी सेवाओं के बहिष्कार से स्थिति और गंभीर हो गई है। हालांकि, स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि मरीजों को असुविधा से बचाने के लिए पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। विभाग जिला कलेक्टरों और अस्पताल प्रशासकों के साथ मिलकर स्थिति की लगातार समीक्षा कर रहा है।

एक आधिकारिक विज्ञप्ति में बताया गया है कि इमरजेंसी विभागों, आईसीयू, प्रसूति सेवाओं, ऑपरेशन थिएटर और डायलिसिस यूनिट जैसी आवश्यक सेवाओं को सुचारू रूप से चलाने के लिए विशेष व्यवस्था की गई है। साथ ही, ज़रूरत पड़ने पर अतिरिक्त डॉक्टरों को स्टैंडबाय पर रखा गया है और दवाओं, ऑक्सीजन व खून की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की जा रही है। सरकार पर जूनियर डॉक्टरों के स्टाइपेंड पर सालाना लगभग 586.08 करोड़ रुपये का खर्च आता है और 15% बढ़ोतरी से उस पर 87.91 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।

इनपुट: IANS

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News4Social हेल्थ डेस्क

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