जम्मू-कश्मीर: प्रतिबंधित जमात-ए-इस्लामी के खिलाफ बड़ी कार्रवाई, सोपोर में 26 ठिकानों पर पुलिस की छापेमारी
जम्मू-कश्मीर के सोपोर में पुलिस ने आतंकवाद से जुड़े एक मामले में प्रतिबंधित संगठन जमात-ए-इस्लामी (JeI) के खिलाफ एक बड़ा तलाशी अभियान चलाया है। रविवार को हुई इस कार्रवाई में 26 अलग-अलग जगहों पर एक सा…
जम्मू-कश्मीर के सोपोर में पुलिस ने आतंकवाद से जुड़े एक मामले में प्रतिबंधित संगठन जमात-ए-इस्लामी (JeI) के खिलाफ एक बड़ा तलाशी अभियान चलाया है। रविवार को हुई इस कार्रवाई में 26 अलग-अलग जगहों पर एक साथ छापेमारी की गई। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, यह पूरी कार्रवाई गैर-कानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम, यानी UAPA के तहत की गई है।
अधिकारियों ने बताया कि इस तलाशी अभियान का मुख्य उद्देश्य प्रतिबंधित जमात-ए-इस्लामी नेटवर्क के संबंधों का पता लगाना और मामले से जुड़े सबूत इकट्ठा करना है। यह संगठन लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों के निशाने पर रहा है।
क्या है जमात-ए-इस्लामी और क्यों है प्रतिबंधित?
जमात-ए-इस्लामी को केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) ने UAPA के तहत एक गैर-कानूनी संगठन घोषित किया हुआ है। इस समूह पर अलगाववादी और आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप हैं। 2019 के पुलवामा हमले के बाद इस पर पहली बार प्रतिबंध लगाया गया था, जिसे फरवरी 2024 में और पांच साल के लिए बढ़ा दिया गया। अधिकारी राष्ट्रीय संप्रभुता और सुरक्षा के लिए खतरे को इस प्रतिबंध का मुख्य कारण बताते हैं।
संगठन का इतिहास और प्रमुख चेहरे
जम्मू-कश्मीर में जमात-ए-इस्लामी का गठन 1950 के दशक में हुआ था। संगठन स्कूलों और सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों का एक बड़ा नेटवर्क चलाता रहा, लेकिन साथ ही इस पर कट्टर धार्मिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने के भी आरोप लगते रहे हैं। यह कश्मीर को एक विवादित क्षेत्र मानता है।
इसके प्रमुख नेताओं में मौलाना सादुद्दीन ताराबली शामिल थे, जिन्होंने 1953 में इसकी स्थापना की। वहीं, सैयद अली शाह गिलानी इसके सबसे प्रमुख और विवादास्पद चेहरों में से एक थे। अलगाववादी हिंसा शुरू होने से पहले गिलानी ने जम्मू-कश्मीर विधानसभा के लिए आठ बार चुनाव लड़ा, जिसमें तीन बार जीत हासिल की। बाद में वह जमात से अलग हो गए और 2021 में अपनी मृत्यु तक पाकिस्तान-समर्थक कट्टर रुख पर कायम रहे।
इनपुट: IANS



