तमिलनाडु: CM विजय की जन्माष्टमी बधाई से द्रविड़ राजनीति में नए समीकरणों की चर्चा
तमिलनाडु की राजनीति, जो लंबे समय से पेरियार के तर्कवादी और धर्म-निरपेक्ष सिद्धांतों पर चलती रही है, अब एक संभावित वैचारिक मोड़ पर खड़ी दिख रही है। इसकी वजह मुख्यमंत्री विजय का श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के…
तमिलनाडु की राजनीति, जो लंबे समय से पेरियार के तर्कवादी और धर्म-निरपेक्ष सिद्धांतों पर चलती रही है, अब एक संभावित वैचारिक मोड़ पर खड़ी दिख रही है। इसकी वजह मुख्यमंत्री विजय का श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर दिया गया बधाई संदेश है, जिसने राज्य के राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस कदम को द्रविड़ राजनीति की स्थापित परंपराओं से एक महत्वपूर्ण विचलन के रूप में देखा जा रहा है।
शुक्रवार को दिए अपने संदेश में मुख्यमंत्री ने न केवल लोगों की खुशी की कामना की, बल्कि धर्म, सदाचार और प्रेम पर भगवान कृष्ण की शिक्षाओं का भी उल्लेख किया। यह उस राज्य में एक उल्लेखनीय घटना है जहां द्रविड़ आंदोलन के बड़े नेता, जैसे सीएन अन्नादुरई और एम करुणानिधि, धार्मिक प्रतीकों के सार्वजनिक इस्तेमाल से बचते रहे हैं। यहां तक कि पूर्व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन द्वारा भी हिंदू त्योहारों पर बधाई देने की कोई सार्वजनिक जानकारी नहीं है।
द्रविड़ आंदोलन और उसकी विरासत
20वीं सदी की शुरुआत में पेरियार ईवी रामासामी के नेतृत्व में शुरू हुए द्रविड़ आंदोलन का मूल उद्देश्य जाति-आधारित भेदभाव और ब्राह्मणवादी वर्चस्व का विरोध करना था। आंदोलन ने धार्मिक रूढ़िवादिता को नकारते हुए तर्कवाद, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय को अपनी विचारधारा का आधार बनाया। इसी वैचारिक नींव ने दशकों तक तमिलनाडु की राजनीति को आकार दिया है।
विजय की नई राजनीतिक रणनीति?
विश्लेषकों का मानना है कि मुख्यमंत्री विजय का यह कदम उनकी एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकता है। अपनी पार्टी 'तमिलगा वेट्री कझगम' (TVK) के नेता के रूप में, वह तमिलनाडु के प्रतिस्पर्धी राजनीतिक परिदृश्य में अपनी अलग जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि वह तमिल गौरव के साथ चुनिंदा धार्मिक समावेशिता को जोड़कर एक मिला-जुला मॉडल पेश करना चाहते हैं। एक लोकप्रिय अभिनेता के तौर पर उनकी छवि उन्हें युवा मतदाताओं से जुड़ने में मदद कर सकती है, जो शायद पेरियार के कट्टर तर्कवाद से उतने प्रभावित न हों।
संभावित प्रभाव और भविष्य
हालांकि, इस नई दिशा के अपने जोखिम भी हैं। एक ओर जहां यह कदम उदार हिंदू मतदाताओं को आकर्षित कर सकता है जो सांस्कृतिक समावेशिता को पसंद करते हैं, वहीं दूसरी ओर यह कट्टर द्रविड़ समर्थकों को नाराज कर सकता है। वे इसे आंदोलन के मूल सिद्धांतों से एक तरह का विश्वासघात मान सकते हैं। एमजी रामचंद्रन (MGR) जैसे लोकप्रिय नेता ने भी, जिन्होंने AIADMK की स्थापना की, कभी पेरियार की नास्तिक विचारधारा को पूरी तरह नहीं अपनाया, लेकिन उन्होंने भी धार्मिक प्रतीकों के खुले समर्थन से परहेज किया था। विजय का यह कदम तमिलनाडु की राजनीति पर क्या असर डालेगा, यह तो समय ही बताएगा।
इनपुट: IANS



