सूरत नासिरनगर विध्वंस मामला: SMC ने 5 इंजीनियरों को किया सस्पेंड, विभागीय जांच के आदेश
गुजरात के सूरत में नासिरनगर इलाके में 100 से ज़्यादा घरों को तोड़े जाने के विवादास्पद मामले में सूरत नगर निगम (SMC) ने बड़ी कार्रवाई की है। समाचार एजेंसी IANS से मिली जानकारी के अनुसार, निगम ने बुधवार
गुजरात के सूरत में नासिरनगर इलाके में 100 से ज़्यादा घरों को तोड़े जाने के विवादास्पद मामले में सूरत नगर निगम (SMC) ने बड़ी कार्रवाई की है। समाचार एजेंसी IANS से मिली जानकारी के अनुसार, निगम ने बुधवार को अपने पांच सिविल इंजीनियरिंग अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। यह कदम गुजरात हाई कोर्ट द्वारा इस घटना की गहन जांच किए जाने के बीच उठाया गया है।
निलंबन का यह फैसला नगर निगम द्वारा गठित एक विशेष जांच समिति की रिपोर्ट के आधार पर लिया गया। निवासियों द्वारा विध्वंस को हाई कोर्ट में चुनौती दिए जाने के बाद इस समिति का गठन किया गया था। SMC के जनसंपर्क विभाग ने कहा है कि यह निलंबन यह सुनिश्चित करने के लिए किया गया है कि विभागीय जांच 'निष्पक्ष, तटस्थ और पारदर्शी' तरीके से हो।
निलंबित अधिकारी और उन पर लगे आरोप
निलंबित किए गए अधिकारियों में कार्यकारी अभियंता सुजलकुमार प्रजापति और जयंग जीवनरामजीवाला, उप अभियंता अर्पण परमार, सहायक अभियंता मोनिका गधिया और कनिष्ठ अभियंता नरेशकुमार गलचर शामिल हैं।
यह मामला 30 मई को सूरत के केंद्रीय क्षेत्र नासिरनगर में हुई तोड़-फोड़ की कार्रवाई से जुड़ा है, जहाँ स्थानीय लोगों का आरोप है कि करीब 106 घरों को बिना किसी पूर्व सूचना या उचित प्रक्रिया के ध्वस्त कर दिया गया। इस मामले में कार्यकारी अभियंता जयंग जीवनरामजीवाला, जो उस समय क्षेत्रीय अधिकारी के तौर पर कार्रवाई की निगरानी कर रहे थे, जांच के केंद्र में हैं। सोशल मीडिया पर उनके सिर पर रुमाल बांधकर अभियान की देखरेख करने का वीडियो भी वायरल हुआ था।
वहीं, एक अन्य कार्यकारी अभियंता सुजलकुमार प्रजापति की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि विध्वंस स्थल उनके अधिकार क्षेत्र में न होने के बावजूद, उन्होंने इस काम के लिए तीन पोक्लेन मशीनें, दो जेसीबी और लगभग 60 श्रमिक मुहैया कराने के निर्देश दिए थे।
हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी
इस मामले में गुजरात हाई कोर्ट ने प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। 29 जून को हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने सूरत पुलिस आयुक्त अनुपम सिंह गहलोत से पूछा कि विध्वंस के समय पुलिसकर्मियों की मौजूदगी के बावजूद 16 दिनों तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई।
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि यह तोड़-फोड़ सड़क सीमांकन की आड़ में की गई प्रतीत होती है और अगर यह कार्रवाई अवैध थी, तो मौके पर मौजूद पुलिस अधिकारियों का कर्तव्य था कि वे इसे रोकते। कोर्ट ने SMC को अपनी आंतरिक जांच रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है और इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 2 जुलाई की तारीख तय की है।
इनपुट: IANS



