आंध्र प्रदेश ऊर्जा सुरक्षा की ओर: बढ़ती मांग पूरी करने के लिए 1600 मेगावाट थर्मल पावर खरीदेगा
आंध्र प्रदेश में भविष्य की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने और बिजली ग्रिड को स्थिर बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। राज्य सरकार ने 1,600 मेगावाट कोयला आधारित थर्मल पावर खरीदने की योजना बनाई है…
आंध्र प्रदेश में भविष्य की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने और बिजली ग्रिड को स्थिर बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। राज्य सरकार ने 1,600 मेगावाट कोयला आधारित थर्मल पावर खरीदने की योजना बनाई है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस खरीद प्रक्रिया को शुरू करने के लिए राज्य के बिजली नियामक आयोग ने वितरण कंपनियों (डिस्कॉम्स) को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है।
यह खरीद 'डिजाइन, बिल्ड, फाइनेंस, ओन और ऑपरेट' (DBFOO) मॉडल पर आधारित होगी। इसके लिए बिजली अधिनियम, 2003 की धारा 63 के तहत दर-आधारित प्रतिस्पर्धी बोली (टैरिफ-बेस्ड कॉम्पिटिटिव बिडिंग) का रास्ता अपनाया जाएगा। पूरी प्रक्रिया केंद्रीय बिजली मंत्रालय द्वारा जारी किए गए मानक दस्तावेजों पर आधारित होगी।
क्यों पड़ी बिजली खरीदने की जरूरत?
आंध्र प्रदेश में औद्योगिक गतिविधियों, शहरीकरण और निवेश में तेजी से विस्तार हो रहा है, जिससे बिजली की खपत और पीक डिमांड में भारी वृद्धि का अनुमान है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) ने अपनी 'संसाधन पर्याप्तता योजना' में आंध्र प्रदेश को वित्त वर्ष 2035-36 तक लगभग 5,588 मेगावाट की अतिरिक्त थर्मल क्षमता चरणबद्ध तरीके से जोड़ने की सलाह दी है। इसी सिफारिश के तहत, पहले चरण में 1,600 मेगावाट बिजली खरीदने का प्रस्ताव लाया गया है।
ग्रिड की स्थिरता और नवीकरणीय ऊर्जा को सहारा
यह योजनाबद्ध थर्मल क्षमता राज्य को एक भरोसेमंद और जरूरत के मुताबिक उपलब्ध होने वाली बिजली (डिस्पैचेबल पावर) प्रदान करेगी। यह खासकर उन समयों में ग्रिड को स्थिरता देगी, जब मांग चरम पर होती है या सौर और पवन जैसे नवीकरणीय स्रोतों से उत्पादन कम हो जाता है। एक आधिकारिक विज्ञप्ति में कहा गया है कि यह कदम राज्य के बढ़ते नवीकरणीय ऊर्जा पोर्टफोलियो को भी मजबूती प्रदान करेगा, जिससे शाम के समय या मौसम बदलने पर भी बिजली की आपूर्ति सुनिश्चित हो सकेगी।
ट्रांसमिशन और लागत पर नियामक का निर्देश
आंध्र प्रदेश विद्युत नियामक आयोग (APERC) ने वितरण कंपनियों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है कि प्रस्तावित बिजली उत्पादन क्षमता को प्राथमिकता के आधार पर राज्य के अपने ट्रांसमिशन नेटवर्क से जोड़ा जाए। आयोग का मानना है कि इससे राज्य के ट्रांसमिशन ढांचे का बेहतर उपयोग होगा और अंतर-राज्यीय सिस्टम से कनेक्टिविटी में होने वाले जोखिम और देरी कम होगी। हालांकि, नियामक ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि राज्य की सीमा पर बिजली की 'लैंडेड कॉस्ट' (पहुंचने तक की कुल लागत) राज्य के भीतर उत्पादन की लागत से कम पड़ती है, तो अंतर-राज्यीय नेटवर्क से जुड़े प्रोजेक्ट्स को भी प्राथमिकता दी जा सकती है।
इनपुट: IANS



