BRICS Summit: भारत ने कैसे निभाई अहम कूटनीतिक भूमिका? विशेषज्ञ ने बताईं बड़ी सफलताएँ
हाल में संपन्न हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत ने सिर्फ घोषणापत्र तक सीमित न रहते हुए एक बड़ी कूटनीतिक भूमिका निभाई है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ…
हाल में संपन्न हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत ने सिर्फ घोषणापत्र तक सीमित न रहते हुए एक बड़ी कूटनीतिक भूमिका निभाई है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ प्रोफेसर स्वर्ण सिंह ने इस सम्मेलन में भारत के योगदान और सफलताओं का विश्लेषण किया है। समाचार एजेंसी IANS से बातचीत में उन्होंने बताया कि कैसे भारत ने टकराव कम करने से लेकर समूह की छवि बदलने तक कई महत्वपूर्ण मोर्चों पर काम किया।
प्रोफेसर सिंह के अनुसार, भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक जीत ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) को बातचीत की मेज पर लाना रही। उन्होंने बताया कि मई में ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक इन्हीं दोनों देशों के टकराव के कारण किसी सहमति पर नहीं पहुँच सकी थी। लेकिन इस शिखर सम्मेलन में ईरान के राष्ट्रपति और यूएई के क्राउन प्रिंस आमने-सामने बैठकर बात करते दिखे, जो भारत की एक बड़ी सफलता है। प्रोफेसर सिंह ने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि ईरान के राष्ट्रपति एकमात्र राष्ट्राध्यक्ष थे जो दिल्ली आए और प्रधानमंत्री मोदी के अलावा राष्ट्रपति से भी मिले।
विकास और साझेदारी पर रहा ज़ोर
प्रोफेसर सिंह ने कहा कि इस बार सम्मेलन में भू-राजनीति के बजाय आर्थिक और तकनीकी साझेदारी पर ध्यान केंद्रित किया गया। इसका एक बड़ा संकेत यह था कि भारत की ओर से शेरपा के रूप में विदेश मंत्रालय में आर्थिक संबंध सचिव को नियुक्त किया गया था। उनके मुताबिक, भारत की कोशिश ब्रिक्स को पश्चिमी देशों के खिलाफ एक टकराव वाले मंच की छवि से निकालकर विकास-केंद्रित मंच के रूप में पेश करने की थी। सम्मेलन की थीम — बिल्डिंग, रिजिलियंस, इनोवेशन, कोऑपरेशन और सस्टेनेबिलिटी — भी इसी सोच को दर्शाती है।
आतंकवाद और ग्लोबल साउथ पर स्पष्ट रुख
दिल्ली घोषणापत्र में आतंकवाद पर भी विशेष ज़ोर दिया गया है। प्रोफेसर सिंह ने बताया कि घोषणापत्र में चार पैराग्राफ आतंकवाद पर समर्पित हैं, जिनमें जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए हमले का भी विस्तृत उल्लेख है। इसके अलावा, भारत ने खुद को ग्लोबल साउथ के नेता के बजाय उसकी 'आवाज़' के रूप में स्थापित किया है। प्रधानमंत्री मोदी के हवाले से उन्होंने कहा कि भारत की सोच सिर्फ सर्वसम्मति से निर्णय लेना नहीं, बल्कि उन निर्णयों को अंतिम परिणाम तक पहुँचाना भी है।
भविष्य की राह पर बात करते हुए प्रोफेसर सिंह ने कहा कि अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सम्मेलन में रखे गए लगभग 50 ठोस प्रस्ताव आने वाले तीन महीनों में ज़मीन पर कैसे उतरते हैं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के अनुसार, इन प्रस्तावों को आगे बढ़ाने के लिए कई बैठकें होनी हैं, जिनसे इनके परिणाम सामने आएँगे।
इनपुट: IANS



