यूरोप में आग का संकट: सदी के अंत तक 39% ज़्यादा जल सकते हैं जंगल, नई स्टडी में चेतावनी
यूरोप के जंगल भविष्य में आग का और भी भयानक रूप देख सकते हैं। एक नए अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि अगर वैश्विक तापमान वृद्धि को नियंत्रित करने के सर्वश्रेष्ठ प्रयास भी किए जाएं, तब भी सदी के अंत तक…
यूरोप के जंगल भविष्य में आग का और भी भयानक रूप देख सकते हैं। एक नए अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि अगर वैश्विक तापमान वृद्धि को नियंत्रित करने के सर्वश्रेष्ठ प्रयास भी किए जाएं, तब भी सदी के अंत तक यूरोप में आग से जलने वाले क्षेत्र में 39% की वृद्धि हो सकती है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, यह अध्ययन 'ग्लोबल चेंज बायोलॉजी' जर्नल में प्रकाशित हुआ है।
इस शोध के अनुसार, यदि वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.8 डिग्री सेल्सियस तक सीमित भी कर लिया जाता है, तो भी गर्म और शुष्क मौसम के लंबे दौर जंगलों को आग के प्रति अधिक संवेदनशील बना देंगे। बढ़ता तापमान मिट्टी और वनस्पतियों से नमी सोख लेगा, जबकि तेज़ हवाएं आग को और तेज़ी से फैलाने का काम करेंगी।
बढ़ते तापमान का सीधा असर
अध्ययन में सबसे खराब स्थिति की एक भयावह तस्वीर भी पेश की गई है। यदि सदी के अंत तक दुनिया का तापमान 3.6 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाता है, तो यूरोप में जंगल की आग से जलने वाला क्षेत्र मौजूदा स्तर से लगभग तीन गुना हो सकता है। शोधकर्ताओं ने चेताया है कि मौजूदा जलवायु नीतियों को देखते हुए दुनिया लगभग 2.6 डिग्री सेल्सियस की तापमान वृद्धि की राह पर है। यह स्थिति बताती है कि जंगल की आग का खतरा यूरोप के लिए कोई भविष्य की समस्या नहीं, बल्कि एक तत्काल चुनौती है।
इस अध्ययन के प्रमुख लेखक और पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च के शोधकर्ता माइक बिलिंग ने कहा, “बेहतर वन प्रबंधन और प्रभावी अग्निशमन व्यवस्था से आग से होने वाले नुकसान को काफी कम किया जा सकता है।” हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ऊंचे कार्बन उत्सर्जन के बीच केवल आग बुझाने की क्षमता बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा।
मौजूदा हालात और भविष्य की राह
यूरोप इस साल पहले ही इस खतरे का सामना कर रहा है। 2026 के अग्निकाल में अब तक यूरोपीय संघ में छह लाख हेक्टेयर से ज़्यादा ज़मीन आग की भेंट चढ़ चुकी है। ग्रीस, स्पेन, फ्रांस और क्रोएशिया जैसे कई देशों में आग ने पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। अध्ययन इस बात पर भी प्रकाश डालता है कि दशकों तक आग को पूरी तरह दबाने की नीतियों के कारण जंगलों में सूखी वनस्पति जैसी ज्वलनशील सामग्री जमा हो गई है, जिससे अब छोटी आग भी विनाशकारी 'मेगा-फायर' का रूप ले सकती है।
शोधकर्ताओं का निष्कर्ष है कि इस चुनौती से निपटने के लिए जलवायु परिवर्तन पर नियंत्रण और बेहतर वन प्रबंधन, दोनों मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा। इसके लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती के साथ-साथ शुरुआती चेतावनी प्रणाली, सूखी वनस्पति का प्रबंधन और अग्निशमन क्षमताओं को बढ़ाना अनिवार्य होगा।
इनपुट: IANS



