दलाई लामा: जब चीनी सेना से बचने के लिए सैनिक का वेश धर, रातों-रात छोड़ना पड़ा था तिब्बत
मार्च 1959 की वो रात, जब तिब्बत के आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा को अपनी पहचान छिपाकर एक आम सैनिक का वेश धारण करना पड़ा था। चीनी सेना के बढ़ते दबाव और एक सशर्त निमंत्रण के बाद पैदा हुए खतरे को भाँपते हुए
मार्च 1959 की वो रात, जब तिब्बत के आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा को अपनी पहचान छिपाकर एक आम सैनिक का वेश धारण करना पड़ा था। चीनी सेना के बढ़ते दबाव और एक सशर्त निमंत्रण के बाद पैदा हुए खतरे को भाँपते हुए उन्होंने अपनी मातृभूमि को हमेशा के लिए छोड़ने का कठिन निर्णय लिया। इसी के साथ उनके भारत में निर्वासन का दौर शुरू हुआ, जो आज भी जारी है।
समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, यह घटनाक्रम 10 मार्च 1959 को एक चीनी जनरल झांग चेनवू के निमंत्रण से शुरू हुआ। जनरल ने दलाई लामा को एक कार्यक्रम में आमंत्रित किया, लेकिन साथ में कुछ शर्तें भी रखीं। इन शर्तों में कहा गया कि दलाई लामा के साथ कोई तिब्बती सैनिक नहीं आएगा और उनके अंगरक्षक भी निहत्थे होंगे। इस अजीब निमंत्रण से ल्हासा के लोगों में अनहोनी की आशंका फैल गई और हज़ारों की संख्या में लोग नोरबुलिंगका महल के बाहर जमा हो गए, ताकि वे अपने नेता को वहाँ जाने से रोक सकें।
तिब्बत से भारत तक का सफ़र
लोगों के विरोध के एक हफ़्ते बाद, 17 मार्च 1959 को नेचुंग ओरेकल (तिब्बती देववाणी) से परामर्श के बाद दलाई लामा को तत्काल तिब्बत छोड़ने का स्पष्ट निर्देश मिला। उसी रात करीब 10 बजे, वे एक साधारण सैनिक के वेश में भीड़ से बचकर निकल गए। बाद में उनका परिवार और अन्य सहयोगी भी उनके साथ हो लिए। ल्हासा से निकलकर तीन हफ़्तों की कठिन यात्रा के बाद, दलाई लामा और उनका दल 31 मार्च 1959 को भारतीय सीमा पर पहुँचा, जहाँ भारतीय सैनिकों ने उन्हें अपनी सुरक्षा में ले लिया।
उस समय अरुणाचल प्रदेश को 'नेफा' के नाम से जाना जाता था। उन्हें पहले अरुणाचल के तवांग और फिर असम लाया गया। भारत पहुँचने के कुछ हफ़्तों बाद उनकी मुलाक़ात तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से हुई, जिसके बाद भारत द्वारा उन्हें आधिकारिक तौर पर शरण देने की घोषणा की गई।
कौन हैं दलाई लामा?
6 जुलाई 1935 को तिब्बत के एक छोटे से गाँव तक्तसेर में जन्मे तेनजिन ग्यात्सो को महज़ दो साल की उम्र में 13वें दलाई लामा के पुनर्जन्म के रूप में मान्यता दी गई थी। 'दलाई लामा' का अर्थ 'ज्ञान का सागर' होता है और तिब्बती लोग उन्हें 'इच्छा पूरी करने वाला रत्न' (येशिन नोरबू) भी कहते हैं। 1950 में चीन के खतरे को देखते हुए उन्हें राष्ट्राध्यक्ष के तौर पर पूरी राजनीतिक सत्ता सौंप दी गई थी।
तिब्बत के बिगड़ते हालात को लेकर उन्होंने 1954 में माओ त्से-तुंग जैसे चीनी नेताओं से बीजिंग में और 1956 में भारत यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नेहरू से भी चर्चा की थी, लेकिन कोई हल नहीं निकल सका। 1959 में चीनी सैन्य कब्जे के बाद उन्हें अंततः भारत में शरण लेनी पड़ी। 1960 से वे हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में रह रहे हैं, जो निर्वासित तिब्बती सरकार का मुख्यालय भी है और जिसे 'छोटा ल्हासा' भी कहा जाता है।
इनपुट: IANS



