सवाल 14 – क्या आप जानते है, रावण को कैसे मिला अमर होने का वरदान

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सवाल 14 – क्या आप जानते है, रावण को कैसे मिला अमर होने का वरदान

दशहरे पर सभी लोग रावण के वध की बात करते है उसके इतने विद्वान होने के बावजूद भी लोग उसे बुराई का प्रतीक मानते है, लेकिन रावण से जुड़े कई ऐसे रहस्य है जो शायद आपको ही पता होगें. आइये आज बात करते है कुछ ऐसे ही रहस्यों की जिस से शायद आप जान सकें रावण इतना शक्तिशाली और विद्वान कैसे बना और जिसके बावजूद भी वह इस तरह वध में मारा क्यों गया.


रावण की माता कैकसी और पिता विश्वेश्रवा जो की महान ऋषि थे. लेकिन कैकसी को राक्षसी प्रवत्ति की संतान प्राप्त होने का योग था. जिसके वजह से उन्होंने ऋषि मुनियों से तप द्वारा इसका उपाय माँगा तब कैकसी को उनकी छोटी संतान धर्मात्मा होने का वरदान मिला. जब कैकसी और विश्वेश्रवा की पहली संतान हुयी तो वह दस सिरों के साथ थी. जिसका नाम दसग्रीव यानी रावण रखा गया.

वहीं कैकसी की दूसरी संतान कुम्भकरण था जो की बेहद विशाल शरीर के साथ हुआ. इसके बाद कैकसी ने सूपनखा और विभीषण को जन्म दिया. वरदान के मुताबिक विभीषण सभी संतानों से अलग थे और भक्ति भाव में लींन रहते थे.


रावण के पिता विश्वेश्रवा ने उन्हें पूरी तरह से ब्राहमण समाज की शिक्षा दीक्षा दी जिसके बाद वह ब्रह्माण्ड में सबसे ज्यादा ज्ञानी बना. लेकिन जैसे जैसे कुम्भकरण और रावण बड़े हुए उन दोनों के अत्याचार भी बढ़ते गये और राखसी प्रवत्ति सामने आती गयी. एक दिन लंका के राजा कुबेर ऋषि विश्वेश्रवा से मिलने गये तो कैकसी ने अपने पुत्रो को कुबेर के वैभव को देख उन्हें भी ऐसा वैभवशाली बनने का सुझाव दिया.


माता की आज्ञा के अनुसार तीनो भाई रावण , कुम्भकरण और विभीषण भगवान् ब्रम्हा की आराधना के लिए निकल गये. विभीषण पहले से ही भक्ति भाव के थे और उन्होंने 5 हजार साल तक ब्रम्हा की आराधना करते हुए उन्हें खुश किया जिसके बाद ब्रम्हा ने उन्हें असीम भक्ति का वर दिया.

वहीं कुम्भकरण ने अपनी इन्द्रियों को वश में रखते हुए 10 हजार साल तक ताप किया था जिसके बाद उन्होंने वर मांगते समय चूक कर दी और इन्द्रासन की जगह निन्द्रासन मांग लिया. जिसके कारण वह 6 महीने सोते और 6 महीने जागते थे. ऐसा कहा जाता है कि उस वक्त कुम्भकरण मुंह में सरस्वती ने वास किया था. क्योकि कुम्भकरण की वजह से धरती पर हाहाकार मंचा हुआ था. इससे देवगण भी काफी परेशान थे.


बता दें कि रावण ने भी 10 हजार साल तक कठोर तपस्या की थी. हर हजारवें साल में वह अपना सर भगवान के चरणों में समर्पित करता था. जिससे भगवान् ने खुश हो कर उन्हें वरदान मांगने को बोला, तो रावण ने अपनी शक्ति का घमंड करते हुए वर माँगा की कोई भी देव दानव किन्नर उसका वध न कर सकें. लेकिन अपनी शक्ति में चूर रावण ने मनुष्य और जानवरों को छोड़ दिया.


रावण इस वरदान को पाकर खुद को ज्यादा शक्तिशाली समझने लगा था. जिससे बाद धरती पर राखसों का अत्याचार दिन प्रतिदिन बढ़ता ही चला गया. रावण ने लंका के राजा कुबेर से उनकी सोने की लंका और पुष्पक विमान भी छीन लिया.


रावण के दिन प्रतिदिन बढ़ते अत्याचार और घमंड में चूर करने के लिए भगवान् विष्णु ने मनुष्य में राजा दशरथ के घर जन्म लिया और राजा दशरथ के पुत्र राम ने वानरों के साथ मिलकर रावण की मृत्यु की.

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