चंद्रयान-2 कैसे मिले चंद्रमा की सतह पर विक्रम लैंडर के निशान?

0
c-2
चंद्रयान-2 कैसे मिले चंद्रमा की सतह पर विक्रम लैंडर के निशान?

नासा ने चंद्रमा पर भारत के महत्वकांक्षी चंद्रयान-2 के विक्रम लैंडर का मलबा यानी उनके निशान मिलने का दावा किया है. जिसकी एक तस्वीर को साझा किया गया है. विक्रम लैंडर की सात सितंबर को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग कराने की भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की कोशिश नाकाम रही थी और लैंडिंग से कुछ मिनट पहले लैंडर का इसरो से सम्पर्क टूट गया था.

नासा ने अपने ‘लूनर रिकॉनसन्स ऑर्बिटर’ (एलआरओ) से ली गई तस्वीर में अंतरिक्ष यान से प्रभावित स्थल को और उस स्थान को दिखाया है जहां पर मलबा हो सकता है. लैंडर के हिस्से कई किलोमीटर तक लगभग दो दर्जन स्थानों पर बिखरे हुए हैं.

नासा ने अपने एक बयान में बताया है कि उसने स्थल की एक तस्वीर 26 सितम्बर को साझा किया है और लोगो से उस तस्वीर में लैंडर के मलबे को पहचानने की अपील की है. साथ ही नासा ने यह भी बताया है कि शनमुगा सुब्रमण्यन ने एलआरओ परियोजना से संपर्क किया और मुख्य दुर्घटनास्थल से लगभग 750 मीटर उत्तर पश्चिम में पहले टुकड़े की पहचान की है.

नासा को जब इस बात की जानकारी मिली जिसके बाद एलआरओसी दल ने पहले की और बाद की तस्वीरें मिला कर इसकी पुष्टि की है. पहले की तस्वीरें जब मिलीं थी तब खराब रोशनी के कारण आसानी से नहीं पहचान हो पाई थी. इन तस्वीरों को 14 से 15 अक्टूबर और 11 नवम्बर को दो तस्वीरें हासिल की गईं.

एलआरओसी दल ने इसके आसपास के इलाके में छानबीन की और उसे प्रभावित स्थल तथा मलबा मिला. नासा के अनुसार नवम्बर में मिली तस्वीर के पिक्सल और रोशनी सबसे बेहतर थी. भारत का यह अभियान सफल हो जाता तो वह अमेरिका, रूस और चीन के बाद चांद पर पहुंचने वाला चौथा देश बन जाता.

बता दें कि इससे पहले केंद्र सरकार ने चंद्रयान 2 के विक्रम लैंडर की चंद्रमा की सतह पर हार्ड लैंडिंग के कारणों की जानकारी दी थी. लोकसभा में पूछे गए एक सवाल के लिखित जवाब में प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह जो अंतरिक्ष विभाग को देखते हैं ने कहा कि डिसेंट के दौरान विक्रम लैंडर के वेग में कमी तय मापदंडों से अधिक थी और इस वजह से उसकी हार्ड लैंडिंग हुई.

यह भी पढ़ें : जाने दूसरे देश में रेप मामले की सजा ?

उन्होंने कहा था, “चांद की सतह से 30 किलोमीटर से 7.4 किलोमीटर की दूरी के बीच डिसेंट का पहला फेज किया गया था. इस दौरान वेग 1,683 मीटर प्रति सेकंड से घटाकर 146 मीटर प्रति सेकेंड कर दिया गया था. इस कारण तय लैंडिंग साइट के 500 मीटर के दायरे में विक्रम की हार्ड लैंडिंग हुई.”