चेन्नई: 5,000 मछुआरों की आजीविका पर संकट? बिना NOC बन रहे मामल्लन जलाशय पर दो विभागों में तनातनी
तमिलनाडु के चेंगलपट्टू में बन रहे मामल्लन जलाशय प्रोजेक्ट को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। चेन्नई की पेयजल आपूर्ति बढ़ाने के मकसद से बन रही इस महत्त्वाकांक्षी परियोजना का लगभग 30 प्रतिशत काम…
तमिलनाडु के चेंगलपट्टू में बन रहे मामल्लन जलाशय प्रोजेक्ट को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। चेन्नई की पेयजल आपूर्ति बढ़ाने के मकसद से बन रही इस महत्त्वाकांक्षी परियोजना का लगभग 30 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है, लेकिन यह सब मत्स्य विभाग से अनिवार्य अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) लिए बिना ही किया जा रहा है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के अनुसार, इस वजह से जल संसाधन विभाग (डब्ल्यूआरडी) और मत्स्य विभाग के बीच खींचतान की स्थिति बन गई है।
यह जलाशय कोवलम सब-बेसिन में ईस्ट कोस्ट रोड और ओल्ड महाबलीपुरम रोड के बीच स्थित है। जनवरी में पूर्व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने इस परियोजना की आधारशिला रखी थी। इसका डिज़ाइन 5,161 एकड़ में 2.25 हजार मिलियन क्यूबिक फीट पानी के वार्षिक भंडारण के लिए किया गया है।
देरी से मांगी गई मंजूरी
हैरानी की बात यह है कि निर्माण कार्य शुरू होने के लगभग छह महीने बाद, जल संसाधन विभाग ने 21 जुलाई को मत्स्य विभाग से एनओसी के लिए औपचारिक तौर पर संपर्क किया। इस देरी ने सरकारी महकमों में चिंता पैदा कर दी है, क्योंकि यह परियोजना समुद्र तट के पास है और इससे लगभग 5,000 मछुआरा परिवारों की आजीविका सीधे तौर पर प्रभावित हो सकती है।
एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने इस प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा, "जब कोई बड़ा प्रोजेक्ट तट के करीब हो और मछुआरों की आजीविका पर असर डालता हो, तो पहले से मंजूरी और सही एनओसी लेना जरूरी है। जरूरी मंजूरी लिए बिना निर्माण शुरू करने देना एक गलती थी।" अधिकारी ने यह भी पूछा कि जब प्रोजेक्ट का उद्घाटन हो चुका था और काफी काम पूरा हो गया था, तो डब्ल्यूआरडी ने जुलाई तक अपनी अर्जी क्यों नहीं दी।
मत्स्य विभाग ने मांगी अतिरिक्त जानकारी
मत्स्य विभाग का कहना है कि उसने डब्ल्यूआरडी से परियोजना के संभावित पर्यावरणीय और आजीविका संबंधी प्रभावों का आकलन करने के लिए अतिरिक्त जानकारी मांगी है। विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, बार-बार अनुरोध के बावजूद उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं मिला है। सभी जरूरी दस्तावेजों की जांच के बाद ही विभाग यह तय करेगा कि मंजूरी दी जाए या नहीं और अगर दी जाए तो किन शर्तों के साथ। इस विवाद ने बड़े बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट्स में विभिन्न सरकारी विभागों के बीच समन्वय की कमी को उजागर कर दिया है।
इनपुट: IANS



