बांग्लादेश में खसरे का कहर: तीन महीनों में 800 से ज़्यादा बच्चों की मौत, टीकाकरण में कमी बनी वजह
बांग्लादेश पिछले तीन महीनों से खसरे के गंभीर प्रकोप से जूझ रहा है, जिसमें अब तक 825 बच्चों की जान जा चुकी है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि टीकाकरण…
बांग्लादेश पिछले तीन महीनों से खसरे के गंभीर प्रकोप से जूझ रहा है, जिसमें अब तक 825 बच्चों की जान जा चुकी है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि टीकाकरण कवरेज में कमी और निगरानी में ढिलाई इस संकट के मुख्य कारण हैं। यह स्थिति तब और चिंताजनक हो जाती है जब सोमवार सुबह 8 बजे तक, बीते 24 घंटों में ही खसरे जैसे लक्षणों से पांच और बच्चों की मौत की पुष्टि हुई।
स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (डीजीएचएस) के आंकड़ों के मुताबिक, कुल 825 मौतों में से 730 संदिग्ध खसरे के मामले हैं, जबकि 95 मौतों की प्रयोगशाला जांच में पुष्टि हो चुकी है। हालांकि, लैब से पुष्टि वाले मौत का आंकड़ा पिछले कुछ दिनों से स्थिर बना हुआ है।
लगातार बढ़ रहे हैं संक्रमण के मामले
प्रकोप की गंभीरता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले 24 घंटों में 992 नए संदिग्ध मामले सामने आए हैं, जिससे देश भर में कुल संदिग्ध मामलों की संख्या 1,24,745 तक पहुंच गई है। इसी अवधि में, 113 नए मामलों की प्रयोगशाला में पुष्टि हुई, जिससे कुल पुष्ट मामलों का आंकड़ा 15,555 हो गया है।
आंकड़ों के अनुसार, 15 मार्च से अब तक खसरे के संदिग्ध लक्षणों वाले 1,07,654 मरीज़ों को अस्पतालों में भर्ती कराया गया है, जिनमें से 1,03,467 लोग ठीक होकर घर लौट चुके हैं।
क्या टीकाकरण कवरेज में चूक हुई?
स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स, जैसे ढाका ट्रिब्यून, इस मुद्दे को सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की एक बड़ी विफलता के रूप में देख रही हैं। रिपोर्टों में कहा गया है कि बांग्लादेश कभी भी खसरे के टीके की दोनों खुराकों के लिए आवश्यक 95% कवरेज का लक्ष्य हासिल नहीं कर पाया, जो प्रकोप को रोकने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
चिंता की बात यह है कि 2025 में खसरा टीकाकरण कवरेज घटकर लगभग 57% रह गया। जबकि सरकारी प्रशासनिक आंकड़े हमेशा 100% से अधिक कवरेज दिखाते रहे, वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और यूनिसेफ के अनुमानों के अनुसार, यह 2010 से लगातार 93 से 96 प्रतिशत के बीच ही रहा। आंकड़ों के इस अंतर को एक चेतावनी संकेत माना जा रहा है, जिसे समय पर पहचानने में विफलता के कारण यह संकट इतना बड़ा हो गया।
इनपुट: IANS



