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पापा-चाचा के बिना ही ‘सपा’ के सुल्तान बने ‘टीपू’ अखिलेश

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कहते हैं, पुरूष नहीं समय बलवान होता है। यही बात आज 5 अक्टूबर को अखिलेश की पांच साल के लिए सपा अध्यक्ष के रूप में ताजपोशी से एक बार फिर साबित हो गया। हालांकि सपा के राष्ट्रीय अधिवेशन से पहले अखिलेश और मुलायम के मुलाकात के बाद से ही अधिवेशन में मुलायम के आने की संभावना जताई जा रही थी लेकिन वो नहीं आए, पर टीपू को तो सुल्तान बनना था और वो बने।

एक वक्त था जब राजनीति में मुलायम की ‘तूती बोलती’ थी, यहां तक कि वो एक बार पीएम बनते-बनते रह गए और एक वक्त आज है जब मुलायम की बोलती बंद हो गई है। हालांकि लोग सपा परिवार में चल रहे इस उतार-चढ़ाव को स्क्रिप्टेड कह रहे हैं, अगर ये सही भी है तो भी मुलायम की कमजोरी तो साफ दिखती है। कोई कमजोर व्यक्ति ही इस तरह से जिम्मेदारियों का हस्तांतरण करता है।

सपा वोटर्स पर अखिलेश का एकक्षत्र राज

अब तक सपा में चल रहे घमासान और खींचा-तानी से लोगों को ये लग रहा था कि हो ना हो मुलायम अपनी पार्टी बनाकर सपा के बहुत से नेताओं को तोड़ लें और ऐसा हुआ तो सपा के वो वोटर्स जो मुलायम को मानते हैं वो अखिलेश के खिलाफ वोट करेंगे। लेकिन 25 अगस्त को नई पार्टी बनाने से इंकार करने और शिवपाल को नसीहत देने के बाद से ये साफ हो गया कि सपा के वोटर्स पर केवल और केवल अकिलेश का अधिकार है। कोई नई पार्टी नहीं बनेगी और सपा के अंदर से उनके सामने कोई चुनौति नहीं होगी। हां सपा के ऊपर तो उनका एकक्षत्र राज 2017 विधानसभा चुनाव से पहले ही हो गया था।

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