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‘बम फटा, बेटा मरा, नहीं पता मालेगांव का गुनहगार कौन’: प्रज्ञा समेत 7 आरोपी बरी, विक्टिम फैमिली बोलीं- फिर अजहर-फरहीन को किसने मारा

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‘बम फटा, बेटा मरा, नहीं पता मालेगांव का गुनहगार कौन’:  प्रज्ञा समेत 7 आरोपी बरी, विक्टिम फैमिली बोलीं- फिर अजहर-फरहीन को किसने मारा

‘बम फटा, बेटा मरा, नहीं पता मालेगांव का गुनहगार कौन’: प्रज्ञा समेत 7 आरोपी बरी, विक्टिम फैमिली बोलीं- फिर अजहर-फरहीन को किसने मारा

महाराष्ट्र के मालेगांव में रहने वाले सैयद निसार का बेटा अजहर नमाज पढ़ने निकला था। शाम को लौटते वक्त वह भीकू चौक पहुंचा। अजहर एक बाइक के बगल से गुजर रहा था, तभी ब्लास्ट हो गया। 19 साल के अजहर के अलावा 5 और लोग मारे गए। जवान बेटे की मौत पर सैयद उस दिन ख

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17 साल बाद सैयद निसार की आंखों में फिर आंसू हैं। 31 जुलाई, 2025 को मालेगांव ब्लास्ट पर कोर्ट का फैसला आया। NIA की स्पेशल कोर्ट ने ब्लास्ट के सभी सातों आरोपियों; साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत पुरोहित, रिटायर्ड मेजर रमेश उपाध्याय, अजय राहिरकर, सुधाकर द्विवेदी, सुधाकर चतुर्वेदी और समीर कुलकर्णी, को बरी कर दिया।

कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ मामला साबित नहीं कर सका। अब 80 साल के हो चुके सैयद निसार कहते हैं, ‘कोर्ट के फैसले ने बेटे की मौत का दर्द फिर से ताजा कर दिया। यह फैसला नाइंसाफी है, बिल्कुल गलत है।’

विक्टिम बोले- इंसाफ के लिए हर कोर्ट जाएंगे अदालत के फैसले के बाद दैनिक NEWS4SOCIALमालेगांव पहुंचा। हम ब्लास्ट में जान गंवाने वालों के परिवार से मिले। सबसे पहले सैयद निसार के घर गए। कांपती आवाज और नम आंखों के साथ सैयद उस दिन को याद करते हैं।

वे बताते हैं, ‘मेरा बेटा नमाज पढ़कर मस्जिद से निकला था। वह कोई आवारा लड़का नहीं था। हमेशा वहां जाता था। उसका उस रास्ते से गुजरना, एक बाइक के पास पहुंचना और उसी पल उस बाइक में धमाका हो जाना, यह सब एक पल में हो गया।’

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ये सैयद निसार हैं। कहते हैं, यहां इंसाफ नहीं मिला, तो हम सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे। इंशाअल्लाह, हम न्याय के लिए लड़ेंगे।

सैयद निसार आगे कहते हैं, ‘मेरे बेटे की उम्र उस वक्त सिर्फ 19 साल थी। 17 साल बीत गए। मैं इंसाफ के लिए इंतजार करता रहा। आज अदालत ने हमें यह दिन दिखाया। फिर भी हम चुप नहीं बैठेंगे।’

वे सरकार से अपील करते हुए कहते हैं,

हम बस यही चाहते हैं कि असली गुनहगारों को पकड़ा जाए और उन्हें सख्त सजा दी जाए। हम इंसाफ के लिए हर अदालत तक जाने के लिए तैयार हैं।

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10 साल की फरहीन वड़ा पाव लेने निकली थी, ब्लास्ट में मौत सैयद निसार जैसा ही दर्द मालेगांव के लियाकत शेख का भी है। उनकी 10 साल की बेटी फरहीन वड़ा पाव लेने निकली थी। ब्लास्ट में उसकी मौत हो गई। लियाकत कहते हैं, ‘हमने इंसाफ के लिए 17 साल गवां दिए। अब यह फैसला आया है। यह बिल्कुल गलत है। हम इसे नहीं मानते।’

बेटी की मौत के बारे में लियाकत बताते हैं, ‘मेरी बच्ची घर से वड़ा पाव लेने निकली थी। अचानक जोरदार धमाके की आवाज आई। मैं घबराकर बाहर भागा, तो चारों तरफ अंधेरा और धुआं था। मैं घर लौट आया। मेरी बीवी ने कहा कि फरहीन अब तक वापस नहीं आई। मैंने उसे दिलासा दिया कि आ जाएगी। कुछ ही देर में कोई भागता हुआ आया और बोला कि घायलों में एक छोटी बच्ची भी है।’

‘यह सुनते ही हम फौरन फरहान हॉस्पिटल भागे। वहां मैंने अपनी बच्ची को देखा। मुझसे उसकी पहचान के लिए आईडी मांगी गई। सदमे की हालत में मुझे कुछ दिखाई-सुनाई नहीं दे रहा था।’

ये लियाकत शेख हैं। उनका सवाल है कि अगर बरी आरोपी गुनहगार नहीं हैं, तो सरकार बताए कि असली गुनहगार कौन है।

लियाकत आगे कहते हैं, ‘पहले ATS ने जांच की थी, उसका नतीजा गलत था। उसके बाद हेमंत करकरे ने सबूतों के साथ असली गुनहगारों को पकड़ा था। आज अदालत कह रही है कि वे गुनहगार नहीं हैं। अगर वे बेगुनाह हैं, तो फिर असली गुनहगार कौन हैं। उन्हें हमारे सामने लाओ।’

उस्मान का भतीजा चाय पीने रुका, तभी ब्लास्ट हो गया मालेगांव ब्लास्ट ने जिनका सब कुछ खत्म कर दिया, उनमें उस्मान खान भी शामिल हैं। उन्हें पता था कि कोर्ट का फैसला आने वाला है। वे सुबह से ही बार-बार घड़ी देख रहे थे। कोर्ट ने जैसे ही फैसला सुनाया, उनकी आंखों से आंसू बहने लगे।

उस्मान कहते हैं, ‘मैं इस फैसले से बिल्कुल खुश नहीं हूं। फैसला तो हुआ ही नहीं है। हमारा सवाल ये है कि आखिर मुजरिम है कौन। मसला तो मुजरिम को सजा दिलाने का था।’

ब्लास्ट में उस्मान खान के भतीजे की मौत हुई थी। केस में उस्मान की गवाही भी शामिल की गई थी।

वे बताते हैं, ‘मेरा भतीजा ऑटो चलाता था। रमजान का मुबारक महीना था। त्योहार की वजह से खरीदारी चल रही थी। मेरे भतीजे ने चाय पीने के लिए ऑटो खड़ा किया था।’

उस्मान एक पल के लिए खामोश हो जाते हैं। फिर कहते हैं, ‘जैसे ही वह चाय पीने गया, धमाका हो गया। उसके जिस्म का पिछला हिस्सा पूरी तरह खत्म हो चुका था। हम उसे लेकर भागे। पहले हम फरहान हॉस्पिटल पहुंचे। उन्होंने नासिक ले जाने को कहा। हम नासिक ले गए। वहां से उसे मुंबई के जेजे अस्पताल में भर्ती कराया। वहीं उसकी मौत हो गई।’

क्या सरकार या पुलिस ने आपसे कॉन्टैक्ट किया? उस्मान जवाब देते हैं, ‘हां, पुलिस आई थी। उसके कपड़े वगैरह लेकर गई थी। बाद में जमीयत उलेमा ए हिंद ने बहुत मदद की। उन्होंने ही हमें गवाही देने के लिए तैयार किया। हम 6 लोग बॉम्बे हाईकोर्ट गए थे। बयान दर्ज कराए। कोर्ट की तरफ से हमें मालेगांव तक का किराया और दूसरे खर्चे भी दिए गए थे।’

कोर्ट ने कहा- आरोपियों के खिलाफ सबूत नहीं कोर्ट ने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ मामला साबित नहीं कर सका। धमाके में इस्तेमाल बाइक का मालिकाना हक साबित नहीं हुआ। RDX लाने या रखने का कोई सबूत नहीं मिला। साजिश की बैठकों के भी पुख्ता सबूत नहीं मिले।

323 गवाहों में से करीब 40 गवाह बयान से पलट गए। अदालत ने माना कि जांच में गंभीर चूकें हुईं। ब्लास्ट वाली जगह का पंचनामा ठीक से नहीं हुआ। मेडिकल सर्टिफिकेट में हेरफेर पाया गया। रिटायर्ड मेजर रमेश उपाध्याय से संगठन अभिनव भारत को आतंकी संगठन साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं मिला।

केस की जांच पहले महाराष्ट्र ATS ने की थी। हेमंत करकरे की अगुआई में साध्वी प्रज्ञा और बाकी आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। ATS ने इस ब्लास्ट को अभिनव भारत संगठन की साजिश बताया था। 2011 में जांच NIA को सौंप दी गई। NIA ने ATS की जांच पर सवाल उठाए। मकोका की धाराएं हटाईं। कहा कि ATS ने RDX प्लांट किया और गवाहों पर दबाव डाला। इससे अभियोजन पक्ष की कहानी कमजोर हो गई।

दो जांचें और दोनों में कई अंतर मालेगांव ब्लास्ट केस में महाराष्ट्र ATS और फिर NIA ने जांच की थी। दोनों एजेंसियों की जांच में बड़ा अंतर है। ATS ने दावा किया कि धमाके की साजिश अभिनव भारत संगठन के सदस्यों ने रची थी। इसमें साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत पुरोहित, रमेश उपाध्याय, सुधाकर द्विवेदी, सुधाकर चतुर्वेदी और अजय राहिरकर को मुख्य आरोपी बनाया गया।

ATS ने कहा कि धमाके में प्रज्ञा की बाइक का इस्तेमाल हुआ। बाइक का चेसिस और इंजन नंबर मिटाया गया था। सुधाकर द्विवेदी के लैपटॉप से कथित बैठकों की रिकॉर्डिंग भी मिली। ATS ने आरोपियों पर MCOCA, UAPA और IPC के तहत केस दर्ज किया। एजेंसी ने दावा किया कि धमाके का मकसद मुस्लिम बहुल इलाके में सांप्रदायिक तनाव फैलाना था।

ATS की जांच पर सवाल भी उठे। आरोप लगे कि गवाहों पर दबाव डाला गया और सबूतों को गलत तरीके से पेश किया गया।

2011 में NIA ने जांच संभाली। एजेंसी ने साध्वी प्रज्ञा, शिवनारायण कलसांगरा, श्याम बावरलाल साहू और प्रवीण तक्कलकी के खिलाफ आरोप हटा दिए। लोकेश शर्मा और धन सिंह को आरोपी बनाया गया, लेकिन 2008 के धमाके में उनकी भूमिका साबित नहीं हुई।

NIA ने कहा कि ATS की ओर से दर्ज कबूलनामे मकोका हटने के बाद कानूनी रूप से अमान्य हो गए। कई गवाहों ने बयान वापस ले लिए या उनमें विरोधाभास पाया गया। कुछ गवाहों ने आरोप लगाया कि ATS ने उन्हें गलत तरीके से हिरासत में रखा और टॉर्चर किया।

NIA ने मकोका हटाकर सिर्फ UAPA और IPC के तहत मुकदमा चलाया। 31 जुलाई 2025 को विशेष NIA अदालत ने सभी सात आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत ने माना कि धमाका हुआ, लेकिन यह साबित नहीं हो सका कि बम उसी बाइक पर लगाया गया था, जिसे साध्वी प्रज्ञा से जोड़ा गया था। यह भी साबित नहीं हुआ कि पुरोहित ने RDX का इंतजाम किया या बम बनाया।

ATS और NIA की जांच में बड़ा फर्क था। ATS ने 12 से ज्यादा लोगों को आरोपी बनाया। NIA ने कई आरोपियों को क्लीन चिट दी और आखिर में 7 लोगों पर मुकदमा चला। ATS ने गवाहों के बयान, कबूलनामे और बाइक को सबूत माना। NIA ने इन्हें कमजोर या अमान्य बताया। ATS ने ‘भगवा आतंकवाद’ और ‘अभिनव भारत’ की साजिश पर जोर दिया। NIA ने कहा कि यह साबित नहीं हो सका।

फैसले के बाद हिंदू संगठनों ने जश्न मनाया कोर्ट के फैसले के बाद महाराष्ट्र में हिंदू संगठनों ने जश्न मनाया। BJP नेता और मंत्री नितेश राणे ने कहा कि भगवा आतंकवाद का झूठ फैलाने वालों को माफी मांगनी चाहिए। भगवा आतंकवाद शब्द जानबूझकर फैलाया गया। कोर्ट के फैसले से उन कोशिशों को करारा जवाब मिला है।

आरोपी के वकील बोले- भगवा आतंकवाद का नैरेटिव खत्म बरी हुए आरोपी सुधाकर चतुर्वेदी रणजीत सांगले ने कोर्ट के फैसले के बाद कहा कि यह ऐतिहासिक है। अदालत ने फंडिंग समेत सभी आरोपों को खारिज कर दिया। यह फैसला उस झूठे भगवा आतंकवाद के नैरेटिव पर करारा प्रहार है, जिसे कांग्रेस सरकार ने फैलाया था। अब वह फेक नैरेटिव पूरी तरह खत्म हो गया है।’

‘मामले में कई कानूनी खामियां थीं। UAPA के तहत मुकदमा चलाने की मंजूरी सही अथॉरिटी से नहीं ली गई थी। यह गंभीर गलती थी। मकोका के तहत लगे आरोप पहले ही खारिज हो चुके थे। ATS ने दावा किया था कि सुधाकर चतुर्वेदी के घर से RDX मिला था। बाद में NIA ने अपनी चार्जशीट में इस थ्योरी को ही खारिज कर दिया।’

‘इस केस में न्याय पाने में 17 साल लग गए। साध्वी प्रज्ञा अपनी बेगुनाही को लेकर शुरू से आश्वस्त थीं। उन्होंने 17 साल तक मानसिक प्रताड़ना और अपमान झेला। उन्हें गंभीर शारीरिक यातनाएं दी गईं। इससे उन्हें स्थायी चोटें आईं। आज भी वे उस पीड़ा से जूझ रही हैं। फैसले के बाद वे भावुक हो गईं। उनका भावुक होना स्वाभाविक था।’

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