‘कागज दिखाए, फिर भी पूछ रहे, बांग्लादेश से कब आए’: दिल्ली छोड़कर जा रहे बंगाल-असम के लोग, बोले- हम घुसपैठिए नहीं हिंदुस्तानी h3>
‘हमारा परिवार बंगाल से दिल्ली काम करने के लिए आया, लेकिन यहां हमें परेशान किया जा रहा है। हम बंगाली बोलते हैं और मुस्लिम भी हैं। भाषा और धर्म के आधार पर हमें टारगेट किया जा रहा है। हमें बांग्लादेशी बताकर बेदखल क्यों किया जा रहा है। हम तो अपने देश में
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अमानुर शेख पश्चिम बंगाल के नदिया जिले से 20 साल पहले दिल्ली आ गए थे। पिछले 5 साल से गुरुग्राम से सटे कापा शेरा की एक बस्ती में रह रहे हैं। 19 जुलाई को भाई हफीजुल को पुलिस ने हिरासत में ले लिया। तब से वो अपनी और परिवार की नागरिकता साबित करने की जद्दोजहद में लगे हुए हैं।
दिल्ली-NCR में अवैध बांग्लादेशी-रोहिंग्या की पहचान के लिए अभियान चलाया जा रहा है। इसके तहत पुलिस ने 200 से ज्यादा प्रवासी मजदूरों को हिरासत में लिया है। इनमें गुरुग्राम से करीब 74 लोग हैं, जिनमें 11 पश्चिम बंगाल और 63 असम के हैं। पुलिस को शक है कि ये सभी अवैध तौर पर रह रहे घुसपैठिए हैं। गुरुग्राम के डिटेंशन सेंटर में रखकर इनसे पूछताछ और डॉक्यूमेंट्स का वेरिफिकेशन किया जा रहा है।
पश्चिमी बंगाल की CM ममता बनर्जी ने पुलिस पर पश्चिमी बंगाल के मुस्लिमों को बेवजह परेशान करने का आरोप लगाया है। इन सबके बीच बंगाल और असम के प्रवासी मजदूर दिल्ली छोड़कर अपने घर लौट रहे हैं।
दैनिक NEWS4SOCIALकी टीम ने गुरुग्राम पहुंचकर इनमें से कुछ प्रभावित परिवारों से मुलाकात की और पूरा मामला समझा।
गुरुग्राम की कापा शेरा बस्ती… अमानुर शेख ‘फैक्ट्री से भाई को डिटेंशन सेंटर ले गए, भारतीय होने का सबूत मांग रहे’ सबसे पहले हम गुरुग्राम की कापा शेरा की एक झुग्गी बस्ती में पहुंचे। यहां रहने वाले अमानुर शेख के भाई हफीजुल शेख को पुलिस बांग्लादेशी बताकर डिटेंशन सेंटर ले गई। हम अमानुर से बात ही कर रहे थे कि तभी उन्हें गुरुग्राम के सेक्टर-10 पुलिस स्टेशन से एक फोन आया।
अधिकारी ने फोन पर ही पूछा, ‘हफीजुल शेख के माता-पिता, पत्नी और गांव का नाम क्या है? उसका कॉन्टैक्ट नंबर बताओ।’
अमानुर ने उसकी पत्नी जैसमिन बीबी का फोन नंबर बताया।
सामने से अधिकारी ने कहा, ‘क्या हफीजुल देश से बाहर गया था।’
इस पर अमानुर कहते हैं,
हां, वो 6 साल पहले सऊदी गया था। कुछ साल वहां काम करने के बाद भारत लौट आया। तब से हमारे साथ दिल्ली में रह रहा है। उसके बीवी और दो बच्चे हैं। कुछ साल पहले मलेशिया भी गया था, लेकिन तीन ही महीने में लौट आया।
इस फोन कॉल के बाद अमानुर हमें बताते हैं, ‘मेरा भाई पास की एक फैक्ट्री में नाइट शिफ्ट में काम करता है। 19 जुलाई की रात 8 बजे वो रोज की ही तरह ड्यूटी के लिए घर से निकला था। तभी उसे पुलिस पकड़ ले गई और गुरुग्राम में पुलिस स्टेशन में हिरासत में रखा था।’
वो आरोप लगाते हुए कहते हैं कि पुलिस भाई को बंगाली भाषा में बात करने और मुस्लिम होने के कारण पकड़कर ले गई। उसके पास आधार कार्ड, वोटर आईडी, राशन कार्ड, बैंक खाता और पासपोर्ट सब है। सब नदिया में हमारे घर के एड्रेस पर रजिस्टर्ड है। फिर भी पुलिस हमारी नहीं सुन रही।’
अमानुर शेख बस्ती में पत्नी, बच्चे और भाई हफीजुल शेख के परिवार के साथ रहते हैं। पूरा परिवार हफीजुल के लौटने का इंतजार कर रहा है।
फोन से विदेशी नंबर्स मिले इसलिए पुलिस का शक बढ़ा अमानुर आगे बताते हैं, ’19 की ही रात पुलिस स्टेशन से फोन आया। अधिकारी ने कहा कि तुम्हारे भाई को बांग्लादेशी होने के शक में पकड़ा है। उससे पूछताछ चल रही है। उसके सभी डॉक्यूमेंट थाने लेकर आ जाओ। अगर वो भारतीय होगा, तभी छोड़ेंगे। अगर बांग्लादेशी निकला तो गुरुग्राम सेक्टर 10-ए में बने डिटेंशन सेंटर भेज देंगे। फिर वहां से बांग्लादेश भेज दिया जाएगा।’
‘मैं तुरंत पुलिस स्टेशन पहुंचा। हफीजुल के साथ उस दिन 75 और लोग थे। हालांकि, उनमें ज्यादातर असम के रहने वाले थे। पुलिस ने हफीजुल का मोबाइल चेक करके मुझसे कहा कि वो किसी बांग्लादेशी ग्रुप से जुड़ा हुआ है।’
अमानुर कहते हैं, ‘हफीजुल ने मुझे बताया कि वो खुद उस ग्रुप से नहीं जुड़ा था, बल्कि उसे किसी ने जोड़ा था। उसमें भारतीयों के अलावा और देशों के लोग भी थे। बांग्लादेश का तो सिर्फ एक व्यक्ति जुड़ा हुआ था। मैंने पुलिस को भी बताया कि मेरा भाई दो बार विदेश गया था। इन्हीं सब वजहों से वो बाहर के कुछ एजेंट और ट्रैवल ग्रुप से जुड़ गया, लेकिन वो मानने को तैयार नहीं हुए।’
‘पुलिस बार-बार हफीजुल से कह रही थी कि तुम्हारे दस्तावेज फर्जी हैं। मैंने 20 जुलाई को अपने गांव पत्थर घाटा में पंचायत सभापति से बात की। उन्होंने लोकल पुलिस स्टेशन को सूचना दी। जिसके बाद पश्चिम बंगाल पुलिस ने भाई का वेरिफिकेशन कर NOC दिल्ली पुलिस को भेजी है।’
‘हालांकि, NOC अब तक गुरुग्राम पुलिस को नहीं मिली है। बता रहे हैं कि ये प्रॉपर चैनल के जरिए गुरुग्राम पुलिस तक पहुंचेगी। तब तक हम केवल इंतजार कर सकते हैं।’
हफीजुल खेश की पत्नी जैसमिन बीबी की तस्वीर।
बंगाली बोलते हैं, मुस्लिम भी हैं इसलिए टारगेट पर अमानुर का मानना है कि उनकी दोहरी पहचान के कारण उन्हें और उनके जैसे तमाम परिवारों को निशाना बनाया जा रहा है। वे कहते हैं, ‘मुझे लगता है कि खासकर बंगाली मुस्लिमों को टारगेट किया जा रहा है क्योंकि हम बंगाली भी बोलते हैं और मुस्लिम भी हैं। भाषा और धर्म के आधार पर हमें परेशान किया जा रहा है।’
पुलिस को तो मुझ पर भी शक हुआ। हालांकि मैंने अपने सभी डॉक्यूमेंट पुलिस को दिखाए। उन्होंने मुझसे भी पूछताछ की, लेकिन उसके बाद मुझे जाने दिया।
‘मुझे उम्मीद है कि मेरा भाई भी जल्द छूट जाएगा। हालांकि, अब ऐसे माहौल में हमें यहां रहने में डर लगने लगा है। हम अपने देश में ही सुरक्षित नहीं हैं, लेकिन इसे छोड़कर कहां जाएंगे? हम पुलिस का सहयोग करने को तैयार हैं, लेकिन फिर भी हमें बांग्लादेशी बताकर भारत से बेदखल करने की कोशिश की जा रही है।’
वे आगे कहते हैं, ‘हफीजुल के न होने से उसके बीवी-बच्चे परेशानी से जूझ रहे हैं। यहां तो रोज कमाना और खाना है। अब वो नहीं है तो उसके परिवार को कौन देखेगा। वहीं थाने में पुलिस हफीजुल को जो खाना दे रही है, वो खाने लायक नहीं है। हम रोज शाम को उससे मिलने और खाना पहुंचाने जाते हैं।’
जुल्फिकर शेख आधार-वोटर आईडी सब, फिर भी बेटे को उठा ले गई पुलिस इसी बस्ती में हमारी मुलाकात जुल्फिकर शेख से हुई। यहां रहने वाले बाकी लोगों की तरफ वो भी कचरा बीनने का काम करते हैं। 24 जुलाई को पुलिस उनके घर भी आई थी। उनके बेटे को पकड़कर ले गई।
जुल्फिकर बताते हैं, ‘दोपहर 3 बजे का वक्त था। 15-20 पुलिसवाले मेरे घर आए थे। उस वक्त मैं और मेरी पत्नी काम पर गए हुए थे। घर पर मेरे दोनों बेटे ही थे। पुलिस ने उनसे पूरे परिवार का आधार कार्ड मांगा। छोटे बेटे ने दिखा दिया। तभी एक पुलिस वाला उसके हाथ से मोबाइल छीनकर चेक करने लगा। वहीं दूसरा बड़े बेटे की तरफ देखकर बोल रहा था कि इसे पुलिस स्टेशन लेकर चलो।’
मोबाइल में कुछ न मिलने पर पुलिस ने छोटे बेटे को तो छोड़ दिया, लेकिन बड़े बेटे राकिब को साथ ले गई। वो कह गए कि अगर शाम को माता-पिता स्टेशन नहीं आए तो तुम सबका इंतजाम किया जाएगा। खबर मिलते ही मैं राकिब के सभी डॉक्यूमेंट लेकर स्टेशन पहुंचा। उनकी जांच कर पुलिस ने राकिब को छोड़ दिया।’
जुल्फिकर आगे कहते हैं, ‘मुझे समझ नहीं आ रहा हमारे साथ ऐसा क्यों किया जा रहा है। हमें बांग्लादेशी घुसपैठिया बताया जा रहा है। किसी को भी सड़क से उठाकर ले जा रहे हैं।’
‘मुझे डर है कि पुलिस हमें कभी भी उठाकर ले जाएगी और फिर मारेगी-पीटेगी। मैं यहां डर में नहीं जीना चाहता, मैं दिल्ली से जाना चाहता हूं। मुश्किल यही आ रही है कि सफदरजंग अस्पताल में मेरा टीबी और रीढ़ की हड्डी का इलाज चल रहा है। इसलिए मैं घर नहीं लौट पा रहा। डॉक्टर कहते हैं कि इलाज अभी एक साल और चलेगा।’
गुरुग्राम का खटोला गांव… ‘पुलिस दस्तावेज देखने को भी तैयार नहीं’ इसके बाद हम गुरुग्राम के खटोला गांव पहुंचे। इस इलाके में असम के मुसलमानों की बड़ी आबादी रहती है। सड़क के एक ओर अमेरिकन एक्सप्रेस जैसे कॉर्पोरेट दफ्तरों वाली ऊंची इमारतें हैं। जबकि दूसरी तरफ झुग्गियां है। इस बस्ती में असम के प्रवासी मजदूर रहते हैं, जो इन्हीं दफ्तरों में सफाईकर्मी से लेकर बाकी कई तरह के काम करते हैं।
ये गुरुग्राम का खटोला गांव है, जहां असम के प्रवासी मजदूर बड़ी संख्या में रहते हैं।
आस-पास रहने वाले बताते हैं, ‘यहां पहले करीब 2,000 लोग रहा करते थे, लेकिन अब पूरा इलाका सुनसान पड़ा है। ज्यादातर घरों के बाहर ताले लगे हुए हैं। कुछ घरों में महिलाएं मिलीं, जिनका आरोप है कि पुलिस ने उनके पति को बिना कोई डॉक्यूमेंट्स देखे उठा लिया। बाद में भी दिखाने पर नहीं देखा।‘
बिना कैमरे पर आए यहां रहने वाली सायरा बीबी बताती हैं, ‘पुलिस मेरे पति रोकीबुज हुसैन को पकड़कर ले गई। वो डिटेंशन सेंटर में किस हाल में हैं, मुझे नहीं पता। पुलिस ने मुझसे पूछा था कि मैं कहां की रहने वाली हूं। मैंने बताया कि असम से हूं। फिर वो बिना कुछ देखे कहने लगे तुम सब बांग्लादेश से हो, तुम सबको ले जाएंगे।’
‘जबकि हमारे परिवार का नाम नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस (NRC) में शामिल है। फिर भी वे हमारे घर के मर्दों को ले गए। हमने पूछा कि उन्हें कब छोड़ा जाएगा, तो पुलिस ने हमें शहर छोड़कर जाने को कह दिया। इन सबके बाद रातों-रात लोग यहां से ट्रेन पकड़कर असम लौट गए।’
बंगाल और असम के प्रवासी मजदूर को हिरासत में लिए जाने की घटनाओं के बाद गांव बिल्कुल खाली हो गया है। ज्यादातर प्रवासी मजदूरों के परिवार असम लौट गए हैं।
10 अवैध बांग्लादेशी नागरिक मिले गुरुग्राम से पकड़े गए 70 से ज्यादा मजदूरों और सफाई कर्मचारियों में से अब तक 10 के पास जरूरी डॉक्यूमेंट्स नहीं मिले हैं। लिहाजा उन्हें अवैध प्रवासी बता दिया गया है। गुरुग्राम पुलिस PRO संदीप बताते हैं, ‘गृह मंत्रालय की गाइडलाइंस के मुताबिक कुछ होल्डिंग सेंटर या डिटेंशन कैम्प बनाए गए हैं। संदिग्ध बांग्लादेशी नागरिकों को वहां रखा जा रहा है। उन सेंटरों पर उन्हें सभी बेसिक सुविधाएं, जैसे- मेडिकल सर्विस वगैरह दी जा रही है।’
हम उनके मानवाधिकारों का सम्मान करते हैं। उनमें से अगर कोई खुद को भारतीय नागरिक बताता है, तो हम संबंधित जिलाधिकारियों (DM) से संपर्क करते हैं। अगर DM उनकी भारतीय नागरिकता की पुष्टि करते हैं, तो उन्हें रिहा कर दिया जाता है। जिनकी नागरिकता की पुष्टि नहीं होती है, उनके खिलाफ डिपोर्टेशन की प्रोसेस शुरू कर दी जाती है।’
‘CAA-NRC के कारण शक के घेरे में सिर्फ बंगाली-मुस्लिम’ इस पूरे मामले को लेकर हमने जामिया मिलिया इस्लामिया में असिस्टेंट प्रोफेसर नजीमुद्दीन सिद्दीकी से बात की। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है जिसमें उन्होंने ‘पुश बैक’ के नाम पर हो रहे मानवाधिकारों के उल्लंघन पर कोर्ट से संज्ञान लेने को कहा है।
नजीमुद्दीन बताते हैं, ‘अगर कोई गैरकानूनी तरीके से देश में दाखिल होता है तो हम इसमें प्रशासन के साथ खड़े हैं। ऐसे लोगों को वापस भेजना चाहिए। यहां अवैध प्रवासियों के नाम पर असम और बंगाल के लोगों को निशाना बनाया जा रहा है।’
असम में एक सरकारी टीचर को जबरदस्ती पकड़कर बॉर्डर पार करवा दिया गया। अपने ही देश के नागरिक के साथ ऐसा व्यवहार करना संवैधानिक रूप से भी गलत है।
‘ये ‘पुश बैक’ नहीं है। ये अपने ही लोगों को फेंकना होता है। ऐसे कई मामले हमारे सामने हैं। इसके तार CAA-NRC से भी जुड़े हैं। इस कानून के तहत आप हिंदू बांग्लादेशी को नागरिकता देते हैं। इसलिए ‘घुसपैठिया’ या ‘अवैध’ होने के शक का दायरा सिर्फ मुस्लिमों पर है। हिंदू कभी घुसपैठिया नहीं हो सकते।’
पॉलिटिकल पार्टियों के क्या हैं आरोप गुरुग्राम में हो रही इस कार्रवाई को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ‘भाषायी आतंकवाद’ करार दिया है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, ‘डबल इंजन सरकारों के भारत में बंगालियों पर किए जा रहे इस अत्याचार को देखकर हैरान हूं। आप क्या साबित करना चाहते हैं? ये अमानवीय और निंदनीय है। हम इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे।’
तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने वीडियो मैसेज जारी कर इस कार्रवाई की तुलना जर्मनी के नाजी शासन से की।
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‘मैं बांग्लादेशी नहीं, UP के प्रतापगढ़ जिले से हूं। UP वालों को क्यों हटाया जा रहा है। चुनाव से पहले BJP ने वादा किया था कि जहां झुग्गी है, वहीं मकान देंगे। हमें भी उम्मीद थी, लेकिन उन्होंने झुग्गी की जगह मकान देने के बजाय पूरा मैदान बना दिया। BJP को वोट देना हमारी सबसे बड़ी गलती थी।’ दिल्ली के भूमिहीन कैंप में जन्म से रह रहीं सुनीता का घर 5 जुलाई को कब्जा बताकर तोड़ दिया गया। राशन कार्ड नहीं है, इसलिए मकान भी नहीं मिला। पढ़िए पूरी खबर…
