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विराग गुप्ता का कॉलम: कोर्ट में एआई के असुरक्षित इस्तेमाल से मुश्किलें बढ़ेंगी

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विराग गुप्ता का कॉलम:  कोर्ट में एआई के असुरक्षित इस्तेमाल से मुश्किलें बढ़ेंगी

विराग गुप्ता का कॉलम: कोर्ट में एआई के असुरक्षित इस्तेमाल से मुश्किलें बढ़ेंगी


अदालतों में एआई के इस्तेमाल के लिए सुप्रीम कोर्ट ने नियमों का मसौदा जारी किया है। लेकिन मुकदमों के बोझ से दबी अदालतों में एआई के तदर्थ इस्तेमाल से मुश्किलें और विवाद बढ़ सकते हैं। इनसे जुड़े 4 पहलुओं को समझना जरूरी है :
1. संविधान के अनुच्छेद-145 के अनुसार सुप्रीम कोर्ट को नियम बनाने का अधिकार है। उसके तहत राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट नियम 2013 को मंजूरी दी थी। लेकिन एआई के मसौदे में यह नहीं लिखा कि किस कानून के अनुसार इन्हें बनाया गया है। जिला अदालतें राज्यों के हाई कोर्ट के अधीन हैं। लेकिन हाईकोर्टों को सुप्रीम कोर्ट के अधीन नहीं माना जाता है। अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन से बड़े पैमाने पर न्यायिक सुधार हो सकता है। लेकिन उसके लिए भी सुप्रीम कोर्ट न्यायिक आदेश जारी नहीं कर रहा। इसलिए सुप्रीम कोर्ट के प्रशासनिक आदेश से हाईकोर्टों और जिला अदालतों में एआई लागू करने से संवैधानिक संकट की स्थिति बन सकती है। 2. बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अनुसार एआई को कानूनी मान्यता नहीं है। इसलिए एडवोकेट्स एक्ट के तहत एआई से बनाई गई किसी भी गलत सामग्री के लिए वकील ही जिम्मेदार होंगे। भारत में अभी तक डेटा सुरक्षा कानून और उससे जुड़े नियम लागू नहीं हैं। लंबित और पुराने मामलों में करोड़ों लोगों के संवेदनशील न्यायिक और निजी डेटा का एआई के माध्यम से व्यावसायिक इस्तेमाल असंवैधानिक होगा। इससे पहले वादकारियों और वकीलों की सहमति जरूरी है। अनेक जज एआई के दुरुपयोग से बढ़ रही अराजकता के खिलाफ चिंता जाहिर कर चुके हैं। पंजाब, हरियाणा हाईकोर्ट ने सभी जिला अदालतों को आदेश दिया है कि एआई प्लेटफाॅर्मों का कानूनी रिसर्च और न्यायिक फैसलों में इस्तेमाल नहीं हो सकता। 3. कोरोना के दौरान अदालतों में आनन-फानन में ऑनलाइन सुनवाई और मुकदमों का सीधा प्रसारण शुरू हो गया था। लेकिन 2018 में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के फैसले के अनुसार अभी तक नियमों में जरूरी बदलाव नहीं हुए। न्यायिक सुनवाई के डेटा के व्यावसायिक इस्तेमाल को रोकने के लिए स्पष्ट नियमों के अभाव से न्यायिक प्रशासन पर हमले बढ़ रहे हैं। अदालतों में वॉट्सएप, जूम और यू-ट्यूब जैसे विदेशी प्लेटफॉर्मों के असुरक्षित इस्तेमाल के खिलाफ संघ विचारक केएन गोविन्दाचार्य ने याचिका दायर की थी। चीफ जस्टिस चन्द्रचूड़ ने कहा था दो साल के भीतर स्वदेशी टेक प्लेटफाॅर्म का इस्तेमाल होगा। लेकिन अभी तक अमल नहीं हुआ। 4. एआई के सभी बड़े प्लेटफॉर्म विदेशी हैं। भारत की बैंकिंग प्रणाली को माइथोस जैसी एआई की सुनामी से बचाने के लिए वित्त मंत्री चिंताग्रस्त हैं। एआई के दुरुपयोग को रोकने के लिए आईटी एक्ट में भी स्पष्ट प्रावधान नहीं हैं। मसौदे में डेटा की सुरक्षा और शिकायत निवारण के जरूरी प्रावधान नहीं होने से जिला अदालतों में वकील और जजों की उलझनें बढ़ सकती हैं। प्रधानमंत्री ने तकनीक और एआई के इस्तेमाल से गरीब कैदियों की रिहाई और मुकदमों के बोझ से मुक्ति का आह्वान किया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के मसौदे में एआई के माध्यम से न्यायिक सुधार, छोटे मुकदमों के जल्द निस्तारण और आम जनता को जल्द न्याय देने का रोडमैप नहीं है। जिला अदालतों में पानी, शौचालय और बैठने की बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं। फिर एआई के लिए इन्फ्रा कैसे विकसित होगा? एआई के संस्थागत इस्तेमाल के लिए न्यायिक व्यवस्था से जुड़े पांचों स्तम्भों- जनता, सरकार, न्यायिक प्रशासन, वकील और जजों के साथ परामर्श जरूरी है। उसके अनुसार ही संसद से कानून बने और सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्टों के नियमों में बदलाव हो। अभी तक डेटा सुरक्षा कानून और उससे जुड़े नियम ही लागू नहीं हुए हैं। लंबित और पुराने मामलों में करोड़ों लोगों के संवेदनशील न्यायिक और निजी डेटा का एआई के माध्यम से व्यावसायिक इस्तेमाल असंवैधानिक होगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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