मरांडी के बेटे-भाई के हत्यारे नक्सली की पत्नी का कबूलनामा: जमीन के बदले मुझे उठा लिया, बच्चों से कहा- नक्सली मत बनना h3>
‘सहदेव से मेरी शादी के लिए मां कभी राजी नहीं थीं। हमारा रिश्ता मजबूरी में हुआ। हमारी जमीन पर जमींदारों (मियांओं) का कब्जा था। नक्सलियों की टोली आई और पिता से कहा- जमीन छुड़वा देंगे, बदले में बेटी देनी पड़ेगी। हम बहुत गरीब हैं इसलिए पिता मान गए। 5-6 स
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झारखंड के पूर्व CM बाबूलाल मरांडी के बेटे और भाई के हत्यारे नक्सली सहदेव की पत्नी का ये कबूलनामा अब सामने आया है। पार्वती कहती है कि सहदेव से उसका रिश्ता कई साल पहले ही टूट चुका था। वो खुद भी अपने काम से खुश नहीं था। सहदेव बच्चों से कहता था कि भूलकर नक्सली मत बनना।
15 सितंबर को कोबरा बटालियन और झारखंड पुलिस की टीम ने पाती पिरी के जंगलों में मुठभेड़ के दौरान नक्सली सहदेव सोरेन को मार गिराया था। उस पर 1 करोड़ का इनाम था। सहदेव के साथ ही 25 लाख का इनामी नक्सली रघुनाथ हेम्ब्रम और 10 लाख का इनामी बीरसेन भी मारा गया।
झारखंड में नक्सलियों के खिलाफ ऑपरेशन क्लीन के तहत ये बड़ी कामयाबी रही। सहदेव के एनकाउंटर पर अमित शाह ने भी ट्वीट किया था। इसके तहत सहदेव ही नहीं, इस साल जनवरी से सितंबर के बीच 32 नक्सली मारे गए जबकि 266 गिरफ्तार किए गए।
दैनिक NEWS4SOCIALकी टीम हजारीबाग में नक्सली सहदेव के घर पहुंची और उसके परिवार से बात की। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…
नक्सलियों की टोली बोली- जमीन छुड़वा देंगे, बेटी दे दो सहदेव के परिवार से मिलने के लिए हम झारखंड के हजारीबाग पहुंचे। यहां विष्णुपुर थाना क्षेत्र के भंडेरी गांव में सहदेव का परिवार रहता है। यहां हमारी मुलाकात उसकी पत्नी पार्वती से हुई। वो बोकारो के इटुआ बड़ा गांव की रहने वाली है। पार्वती बताती हैं, ‘गांव में नक्सलियों की टोली आती थी। ये लोग गांव के लोगों से ही खाना बनवाकर खाते और गाना बजाना करते थे।‘
‘ये टोली मेरे गांव भी आती थी। इसी में सहदेव भी शामिल था। हमारी जमीन वहां के जमींदारों ने हथिया ली थी। जंगल भी वहां के मियां लोग खत्म कर रहे थे। इतना ही नहीं गांव की औरतें घर से बाहर निकलतीं तो मुस्लिम लोग उनके साथ गलत काम करते।‘
‘एक बार टोली के लोगों ने पिता से कहा- हम तुम्हारी जमीन छुड़वा देंगे लेकिन इसके बदले अपनी बेटी को हमारे साथ भेजना होगा। उन्होंने हमारी जमीन छुड़वा भी दी और फिर मुझे साथ ले जाने के लिए परिवार पर दबाव बनाने लगे।’
सहदेव के साथ ही उसकी पत्नी पार्वती भी पहले नक्सली थी।
मां टोली के साथ नहीं भेजना चाहती थीं, पिता ने सौंपा पार्वती आगे कहती हैं, ‘मेरी मां इसके लिए तैयार नहीं थी। वो नहीं चाहती थी कि मैं टोली के साथ जाऊं लेकिन पिता जी राजी हो गए। उन्होंने मुझसे कहा कि कुछ दिनों के लिए चली जाओ और टोली के साथ रह लो, फिर लौट आना। हम वहां 5-6 साल रहे और टोली के साथ गाने का काम किया। संगठन में बोलने (स्पीच) का काम बड़ी-बड़ी महिलाएं करती थीं।’
‘बहुत बड़ी टोली थी। हम एक गांव से दूसरे गांव जाते और नाच-गाना करते। हमें पूरी-पूरी रात घूमना पड़ता था। मेरा काम नाच गाना करने का था। मुझे अच्छा लगता क्योंकि हमने बहुत गरीबी देखी थी। खाने तक के लिए मोहताज थे।’
हालांकि फिर मैं अपने गांव लौट आई और 2-3 महीने घर पर ही रही। लेकिन टोली के लोगों ने पीछा नहीं छोड़ा। वो मम्मी-पापा पर मेरी शादी करने का दबाव बनाने लगे।
‘कहते कि इतने दिन हमारे साथ रही, खाना-पीना कराया। अब इसे हमेशा के लिए हमें सौंप दो। वो मेरे मां-बाप से मुझे खिलाने और साथ रखने का हिसाब मांगने लगे।’
‘टोली वाले कहते कि अब तुम्हें बेटी की शादी हमारी टोली के लड़के से करनी पड़ेगी। पापा ने मजबूरी में सहदेव से करा दी। मां इसके लिए राजी नहीं थी। वो आखिरी वक्त तक मना करती रहीं। उन्होंने तो मुझसे ये तक कहा था कि विदा होकर जब टोली से साथ जाना तो कुछ ऐसा कर देना ताकि मुझे भगा दिया जाए।’
सहदेव की पत्नी पार्वती बताती हैं कि उन दोनों का रिश्ता कई साल पहले टूट गया था। बच्चे होने के बाद से वे अलग-अलग ही रह रहे थे।
बच्चे के लिए टोली और संगठन छोड़ा पार्वती शादी के बाद सहदेव के साथ टोली में एक गांव से दूसरे गांव घूमाने लगी। हालांकि बच्चा होने के बाद उसके लिए ये करना मुश्किल हो गया। वे बताती हैं, ‘मां ने कहा कि अब एक जगह रहो। पहले कुछ दिनों तक मैं अपनी मां के साथ रही। फिर सहदेव के गांव भंडेरी रहने चली आई। जबकि सहदेव टोली के साथ ही रहता रहा।’
‘हालांकि संगठन के लोग कहते थे कि टोली मत छोड़ो लेकिन इस बात पर मैंने उन्हें फटकार लगा देती थी। क्योंकि बच्चे से बढ़कर मेरे लिए कुछ नहीं था।’ क्या कभी सहदेव ने नहीं कहा कि संगठन में ही रहो? जवाब में पार्वती कहती हैं, ‘नहीं उसने कभी नहीं कहा। वो अपना आता-जाता रहा। उसके और मेरे रास्ते शुरू से अलग-अलग ही रहे।’
शराब बेचकर बच्चे पाले, सहदेव ने कभी एक कौड़ी नहीं दी फिर क्या आपने बच्चों की परवरिश अकेले ही की। जवाब में पार्वती बताती हैं, ‘सहदेव ने कभी पिता होने की जिम्मेदारी नहीं निभाई। बच्चे को पालने के लिए मेरे पास आमदनी का कोई जरिया नहीं था। समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूं। फिर मैंने शराब बनाकर बेचनी शुरू की। ईंटा ढोने का भी काम किया। बच्चों के लिए सारे फैसले मैंने अकेले ही लिए। न सहदेव ने कभी रुपए-पैसे से मदद की और न ही कभी कोई जिम्मेदारी संभाली।’
वे आगे कहती हैं, ‘मेरे दो बच्चे हैं और दोनों को मैं अकेले ही पाल रही हूं। वो कभी-कभी इनसे मिलने के लिए ही आता था। हमें न उसके जिंदा रहते कुछ मिला और न ही उसके मरने के बाद। ऊपर से मौत के बाद उसका आखिरी क्रिया-कर्म भी हमें ही करना पड़ा।’
‘पूरे गांव को खिलाना पड़ा। इसके लिए छगली (बकरी) और भात का इंतजाम भी किया। हालांकि गांव के लोगों में से कोई मुर्गा तो कोई भात लेकर आया। सभी लोगों ने मदद की।’
सहदेव सोरेन का परिवार बहुत गरीबी में जी रहे हैं। उसके अंतिम संस्कार के लिए भी परिवार को गांववालों से मदद लेनी पड़ी।
सहदेव बच्चों से कहता- मैं गलत रास्ते पर गया, तुम पढ़ो-लिखो क्या सहदेव ने कभी बच्चों को संगठन में शामिल होने के लिए कहा था? पार्वती कहती हैं, ‘नहीं, बिल्कुल नहीं। उलटा वो कहता था कि मैं गलत रास्ते पर चल पड़ा हूं और फंस गया हूं। तुम लोग पढ़ लिखकर कुछ बनो। अपना ध्यान रखो। ये रास्ता तुम्हारे लिए नहीं है।’
‘वैसे भी उसका और मेरा रिश्ता बहुत पहले ही टूट चुका था। बच्चे होने के बाद तो मैंने उसे बच्चों से हमेशा दूर ही रखा। मैंने कह दिया था कि तुम्हारा और मेरा रास्ता अलग है।’ क्या कभी आपने या बच्चों ने सहदेव को सरेंडर करने के लिए कहा? इसके जवाब में पार्वती कहती हैं, ‘बच्चे और मैं हम सब उससे बहुत डरते थे।’
‘एक बार बहुत हिम्मत करके उससे सरेंडर करने के लिए कहा था लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया। जो उसके मन में आता था, वो वही करता था। हम सब इसलिए भी डरते थे क्योंकि उन लोगों (नक्सलियों) का बहुत बड़ा संगठन है। हम उनसे किसी तरह की दुश्मनी मोल नहीं ले सकते। मुझे और बच्चों को जान का खतरा हो सकता था।’
कोबरा बटालियन, गिरिडीह और हजारीबाग पुलिस के जॉइंट ऑपरेशन के बाद पाती पिरी के जंगल से ये सामान बरामद हुए थे।
15 की उम्र में नक्सली बना, चाचा बोले- गांव में टोली आई और साथ ले गई सहदेव के चाचा सीताराम सोरेन बताते हैं, ‘हमारे गांव नक्सलियों की टोली आई थी। तब सहदेव महज 15-16 साल का ही रहा होगा। तभी टोली के लोग उसे अपने साथ लेकर चले गए। वो भी शौक से चला गया।’
‘पुलिस कहती थी कि उससे सरेंडर करवा दो लेकिन अब वो बड़ा हो गया था कोई छोटा बच्चा थोड़ी था। उससे हम भला क्या कह सकते थे। हमें भी पता था कि वो गलत रास्ते पर चला गया है लेकिन वहां से वापस तो नहीं ला सकते थे। वो किसी की बात ही कहां सुनता था।’
अब जान लीजिए नक्सली सहदेव की क्राइम फाइल… पूर्व CM बाबूलाल मरांडी के बेटे और भाई की सरेआम हत्या की सहदेव नक्सलियों की सेंट्रल कमेटी का सदस्य था। वो 25 से 30 लोगों की टोली साथ लेकर चलता था। एक करोड़ का इनामी था और 40 साल की उम्र मौत से पहले उस पर 30 मुकदमे दर्ज थे। 1990-91 में वो नक्सली संगठन से जुड़ा। उस पर झारखंड के पूर्व CM बाबूलाल मरांडी के बेटे हेमंत मरांडी और भाई मुनुलाल मरांडी की हत्या का आरोप था।
2007 में गिरिडीह जिले के चिलखारी गांव में दोनों एक कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि पहुंचे थे। तभी इन पर नक्सलियों ने हमला कर दिया। इसमें कुल 20 लोगों की जान गई थी। हमले के पीछे मास्टरमाइंड के तौर पर सहदेव का नाम सामने आया था।
इसके बाद 2004-05 में गिरिडीह के इंपख गांव के पास नक्सलियों ने एक होमगार्ड कैंप पर हमला किया था और 183 राइफलें लूट ली थीं। हमले का मास्टरमाइंड भी सहदेव था। इसके बाद 2011 में नक्सलियों ने लखीसराय में पुलिस टीम पर हमला किया था। इसमें 10 पुलिसकर्मी मारे गए थे और 35 हथियार लूट लिए गए थे। इस हमले का लीडर भी सहदेव ही था।
नवंबर 2012 में गिरडीह जेल ब्रेक केस हुआ। 32 नक्सली कैदी वाहन से पुलिस की कस्टडी में जा रहे थे। सहदेव के इशारे पर नक्सलियों ने इन्हें छुड़ाने के लिए हमला किया, जिसमें 3 पुलिसकर्मी मारे गए। 29 नक्सली भागने में सफल हुए थे। हमले के बाद पुलिस ने स्पॉट से 1 बोरा बम बरामद किया था।
नक्सलियों के खिलाफ ‘ऑपरेशन क्लीन’ झारखंड में नक्सलियों के खिलाफ सुरक्षा बलों का ‘ऑपरेशन क्लीन’ जारी है। जनवरी से सितंबर 2025 के बीच 32 खूंखार नक्सली मारे गए हैं, जबकि 266 को गिरफ्तार किया गया। 30 नक्सलियों ने सरेंडर भी किया है।
झारखंड पुलिस के आईजी (ऑपरेशन) माइकल राज एस के मुताबिक, बीते 9 महीनों में एनकाउंटर में मारे गए नक्सलियों में विवेक उर्फ प्रयाग मंजही और अनुज उर्फ सहदेव सोरेन जैसे दो कुख्यात नक्सलियों के नाम शामिल हैं। ये दोनों सीपीआई (माओवादी) की सेंट्रल कमेटी के मेंबर थे। दोनों के सिर पर 1-1 करोड़ रुपए का इनाम था।
इनकी मौत को पुलिस ने नक्सलवाद के लिए बड़ा झटका बताया। उन्होंने बताया कि 2 रीजनल कमेटी मेंबर, 1 जोनल कमांडर, 2 सब-जोनल कमांडर और 9 एरिया कमांडर भी गिरफ्तार किए गए हैं। वहीं सरेंडर करने वाले नक्सलियों में सीपीआई के जोनल कमांडर रविंद्र यादव, सब-जोनल कमांडर आनंद सिंह और झारखंड जन मुक्ति परिषद के सब-जोनल कमांडर लवलेश गंझू उर्फ लोकेश गंझू जैसे नाम शामिल हैं। ………………….
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