औरैया में यमुना और चंबल नदी की उफनती लहरें: गांवों में बाढ़ का भरा पानी, लोग छतों पर रहने को मजबूर, डोंगी आने-जाने का बना सहारा – Auraiya News h3>
हिमांशु गुप्ता | औरैया29 मिनट पहले
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औरैया में यमुना और चंबल नदी की उफनती लहरें, गांवों में बाढ़ का भरा पानी।
औरैया में यमुना और चंबल की उफनती लहरें… 10 फीट पानी में डूबा गांव… छत पर बैठी जिंदगी… और डोंगी से गुजरती रोज़मर्रा। यह कोई फिल्मी दृश्य नहीं, बल्कि औरैया ज़िले के बीहड़ क्षेत्र की सच्ची तस्वीर है। जहां अस्ता और नोरी जैसे गांवों में पूरा गांव डूब चुका है। सड़कें जलमार्ग बन गई हैं और लोग छतों को ही अब अपना ठिकाना बना चुके हैं।
दैनिक NEWS4SOCIALकी टीम जिला मुख्यालय से 25 किलोमीटर दूर अस्ता गांव और 35 किलोमीटर दूर नोरी पहुंची, तो सिर्फ पानी ही पानी नजर आया।
गांव पहुंचने का रास्ता अब सिर्फ डोंगी (छोटी नाव) है। जहां पहले बाइक और ट्रैक्टर चलते थे। वहां अब चप्पू चल रहा है। बिजली के पोल आधे से ज्यादा पानी में डूब चुके हैं। कई जगह छत से हाथ बढ़ाओ तो बिजली के तार छूने लगते हैं। खतरा हर जगह है। गांव के अंदर रहने वाले कई परिवार छतों पर टेंट और पन्नी तानकर दिन-रात काट रहे हैं।
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तीन दशक से बाढ़ की मार, हर साल पलायन फिर वापसी
गांव अस्ता के बुजुर्ग बताते हैं कि 1996 में पहली बार बाढ़ आई थी, उसके बाद 2019 से हर साल बाढ़ ने तबाही मचाई। गांव हर साल डूबता है, फिर हम पलायन करते हैं, और बाढ़ उतरने के बाद दोबारा घर बसाते हैं। कहते हैं मंगल सिंह, जो इन दिनों छत पर अपना अस्थाई घर चलाए हुए हैं।
2022 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद गांव आए थे। उन्होंने प्रशासन को निर्देश दिए थे कि गांव को ऊंचाई पर बसाया जाए। प्रस्ताव बना, ग्रामीणों की जमीन ली गई। लेकिन फॉरेस्ट की जमीन अब तक नहीं मिली।
अरविंद निषाद बताते हैं कि हमारी जमीन तो सरकार ने ले ली। लेकिन बदले में रहने को जगह अब तक नहीं मिली। हर साल पानी में डूबकर फिर नई गृहस्थी बनाते हैं।
ग्रामीण बोले- लंच पैकेट से पेट तो भरता है, ज़िंदगी नहीं बदलती
ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन हर बार सिर्फ राहत शिविर और लंच पैकेट तक सीमित रह जाता है। गुड्डी देवी, जो इन दिनों छत पर रह रही हैं। बताती है कि नीचे सारा सामान खाली कर दिया है। बारिश हो तो पन्नी डाल लेते हैं। लालटेन की रोशनी में रात बिताते हैं।
अजब सिंह बाढ़ के समय डोंगी चलाकर लोगों की मदद करते हैं। कहते है कि प्रशासन हर साल डोंगी चलाने को कहता है। लेकिन कभी एक रुपया तक नहीं मिला।
घरों की छत पर बंद हैं लोग
चंबल से मगरमच्छ बहकर फरिहा गांव में पहुंच गया है। ग्रामीणों में डर है। चंबल सेंचुरी की टीम रेस्क्यू में जुटी है लेकिन डर का माहौल बना हुआ है। बच्चों को घर से बाहर निकलने नहीं दिया जा रहा।
30,000 से ज्यादा आबादी प्रभावित
10 से अधिक गांवों में पानी भर चुका है। अस्ता, मई, नोरी, फरिहा, बीजलपुर, जुहीखा, गूंज, असेवा, असेवटा, सिकरोड़ी के 30,000 से ज्यादा लोग प्रभावित है। यमुना खतरे के निशान से ऊपर बह रही है। चेतावनी बिंदु- 112 मीटर। खतरे का निशान- 113 मीटर है। वर्तमान जलस्तर: 115.60 मीटर है।
डॉक्टर टीम तैनात, लालटेन बनी सहारा
बाढ़ से होने वाली बीमारियों को रोकने के लिए डॉक्टरों की टीम भेजी गई है। बिजली पूरी तरह बंद है। जिससे गांवों में सौर लालटेन बांटी गई हैं। कई लोगों के घरों में गर्भवती महिलाएं और छोटे बच्चे हैं। जो दवाओं के सहारे किसी तरह समय काट रहे हैं।
फरिहा में घुस गया मगरमच्छ
फरिहा गांव में यमुना के पानी में चंबल से मगरमच्छ घुस गया। जिससे ग्रामीणों में दहशत है। घर के लोग छतों पर है। मगरमच्छ के दहशत से लोग परेशान है। चंबल सेंचुरी की टीम रेस्क्यू में लगी है।
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हिमांशु गुप्ता | औरैया29 मिनट पहले
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औरैया में यमुना और चंबल नदी की उफनती लहरें, गांवों में बाढ़ का भरा पानी।
औरैया में यमुना और चंबल की उफनती लहरें… 10 फीट पानी में डूबा गांव… छत पर बैठी जिंदगी… और डोंगी से गुजरती रोज़मर्रा। यह कोई फिल्मी दृश्य नहीं, बल्कि औरैया ज़िले के बीहड़ क्षेत्र की सच्ची तस्वीर है। जहां अस्ता और नोरी जैसे गांवों में पूरा गांव डूब चुका है। सड़कें जलमार्ग बन गई हैं और लोग छतों को ही अब अपना ठिकाना बना चुके हैं।
दैनिक NEWS4SOCIALकी टीम जिला मुख्यालय से 25 किलोमीटर दूर अस्ता गांव और 35 किलोमीटर दूर नोरी पहुंची, तो सिर्फ पानी ही पानी नजर आया।
गांव पहुंचने का रास्ता अब सिर्फ डोंगी (छोटी नाव) है। जहां पहले बाइक और ट्रैक्टर चलते थे। वहां अब चप्पू चल रहा है। बिजली के पोल आधे से ज्यादा पानी में डूब चुके हैं। कई जगह छत से हाथ बढ़ाओ तो बिजली के तार छूने लगते हैं। खतरा हर जगह है। गांव के अंदर रहने वाले कई परिवार छतों पर टेंट और पन्नी तानकर दिन-रात काट रहे हैं।
तीन दशक से बाढ़ की मार, हर साल पलायन फिर वापसी
गांव अस्ता के बुजुर्ग बताते हैं कि 1996 में पहली बार बाढ़ आई थी, उसके बाद 2019 से हर साल बाढ़ ने तबाही मचाई। गांव हर साल डूबता है, फिर हम पलायन करते हैं, और बाढ़ उतरने के बाद दोबारा घर बसाते हैं। कहते हैं मंगल सिंह, जो इन दिनों छत पर अपना अस्थाई घर चलाए हुए हैं।
2022 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद गांव आए थे। उन्होंने प्रशासन को निर्देश दिए थे कि गांव को ऊंचाई पर बसाया जाए। प्रस्ताव बना, ग्रामीणों की जमीन ली गई। लेकिन फॉरेस्ट की जमीन अब तक नहीं मिली।
अरविंद निषाद बताते हैं कि हमारी जमीन तो सरकार ने ले ली। लेकिन बदले में रहने को जगह अब तक नहीं मिली। हर साल पानी में डूबकर फिर नई गृहस्थी बनाते हैं।
ग्रामीण बोले- लंच पैकेट से पेट तो भरता है, ज़िंदगी नहीं बदलती
ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन हर बार सिर्फ राहत शिविर और लंच पैकेट तक सीमित रह जाता है। गुड्डी देवी, जो इन दिनों छत पर रह रही हैं। बताती है कि नीचे सारा सामान खाली कर दिया है। बारिश हो तो पन्नी डाल लेते हैं। लालटेन की रोशनी में रात बिताते हैं।
अजब सिंह बाढ़ के समय डोंगी चलाकर लोगों की मदद करते हैं। कहते है कि प्रशासन हर साल डोंगी चलाने को कहता है। लेकिन कभी एक रुपया तक नहीं मिला।
घरों की छत पर बंद हैं लोग
चंबल से मगरमच्छ बहकर फरिहा गांव में पहुंच गया है। ग्रामीणों में डर है। चंबल सेंचुरी की टीम रेस्क्यू में जुटी है लेकिन डर का माहौल बना हुआ है। बच्चों को घर से बाहर निकलने नहीं दिया जा रहा।
30,000 से ज्यादा आबादी प्रभावित
10 से अधिक गांवों में पानी भर चुका है। अस्ता, मई, नोरी, फरिहा, बीजलपुर, जुहीखा, गूंज, असेवा, असेवटा, सिकरोड़ी के 30,000 से ज्यादा लोग प्रभावित है। यमुना खतरे के निशान से ऊपर बह रही है। चेतावनी बिंदु- 112 मीटर। खतरे का निशान- 113 मीटर है। वर्तमान जलस्तर: 115.60 मीटर है।
डॉक्टर टीम तैनात, लालटेन बनी सहारा
बाढ़ से होने वाली बीमारियों को रोकने के लिए डॉक्टरों की टीम भेजी गई है। बिजली पूरी तरह बंद है। जिससे गांवों में सौर लालटेन बांटी गई हैं। कई लोगों के घरों में गर्भवती महिलाएं और छोटे बच्चे हैं। जो दवाओं के सहारे किसी तरह समय काट रहे हैं।
फरिहा में घुस गया मगरमच्छ
फरिहा गांव में यमुना के पानी में चंबल से मगरमच्छ घुस गया। जिससे ग्रामीणों में दहशत है। घर के लोग छतों पर है। मगरमच्छ के दहशत से लोग परेशान है। चंबल सेंचुरी की टीम रेस्क्यू में लगी है।



