ट्रंप-जिनपिंग की मुलाकात से दुनिया पर असर तय, पर किसी बड़ी डील की उम्मीद कम: विशेषज्ञ
दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं, अमेरिका और चीन, के राष्ट्रपतियों की आगामी बैठक वैश्विक राजनीति और बाज़ार दोनों के लिए बेहद अहम मानी जा रही है। समाचार एजेंसी IANS से मिली जानकारी के अनुसार…
दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं, अमेरिका और चीन, के राष्ट्रपतियों की आगामी बैठक वैश्विक राजनीति और बाज़ार दोनों के लिए बेहद अहम मानी जा रही है। समाचार एजेंसी IANS से मिली जानकारी के अनुसार, पूर्व राजनयिक अशोक सज्जनहार का मानना है कि डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच होने वाली इस बातचीत का प्रभाव सिर्फ इन दो देशों तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर पूरी दुनिया पर महसूस किया जाएगा।
सज्जनहार के विश्लेषण के मुताबिक, यह मुलाकात महत्वपूर्ण तो है, लेकिन इससे किसी बहुत बड़े या निर्णायक समझौते की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। संभावना है कि दोनों नेता अपने व्यापारिक संबंधों को बिगड़ने से बचाने और आपसी आर्थिक सहयोग को बनाए रखने पर ही मुख्य रूप से ध्यान केंद्रित करेंगे। अमेरिका और चीन के बीच यह होड़ सिर्फ व्यापार तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक प्रभाव को लेकर भी है। अमेरिका जहां पहले से एक विश्व शक्ति है, वहीं चीन 2049 तक खुद को एक प्रमुख वैश्विक ताकत के रूप में स्थापित करने के लक्ष्य पर काम कर रहा है।
बातचीत के मुख्य बिंदु और दबाव
इस बैठक में दोनों देशों के अपने-अपने एजेंडे होंगे। अमेरिका चीन पर अपने कृषि उत्पादों, विमानों और अन्य सामानों की खरीद बढ़ाने के लिए दबाव बना सकता है। अशोक सज्जनहार ने सीनेटर लिंडसे ग्राहम से जुड़े 100% टैरिफ के प्रस्ताव का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसे कदम ट्रंप को बातचीत में एक मजबूत बढ़त दे सकते हैं, जिसका इस्तेमाल वे बेहतर व्यापारिक समझौता हासिल करने के लिए कर सकते हैं।
दूसरी ओर, चीन की कोशिश यह हो सकती है कि अमेरिका ताइवान को हथियारों की आपूर्ति कम या बंद कर दे। इसके अलावा, अमेरिका चीन पर यह दबाव भी डाल सकता है कि वह रूस और ईरान पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल करे, ताकि मौजूदा वैश्विक संघर्षों और तनाव को कम किया जा सके।
पश्चिम एशिया का तनाव और तेल बाज़ार
पूर्व राजनयिक ने ईरान और अमेरिका के बीच जटिल होते हालात पर भी अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि हूती हमलों से पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ रहा है, जिससे शिपिंग लाइनों, पाइपलाइनों और रिफाइनरियों जैसे अहम ठिकानों पर हमले का खतरा है। अगर ऐसा होता है तो वैश्विक तेल आपूर्ति बाधित हो सकती है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ सकती हैं। उन्होंने इस बात की भी आशंका जताई कि रूस से तेल खरीदने वाले देशों (जैसे भारत, चीन, तुर्किये और हंगरी) पर यदि 100% टैरिफ लगाया गया तो वैश्विक तेल बाजार पर दबाव और बढ़ेगा, जिसका सबसे बुरा असर विकासशील देशों पर पड़ेगा।
इनपुट: IANS



