हिन्दू धर्म में सुख सम्पति की देवी के तौर पर भारतवर्ष में महालक्ष्मी पूजी जाती है। ऐसा माना जाता है जिस घर में महा लक्ष्मी का वास होता है उस घर में धन , सुख , शांति हमेशा विधमान रहती रहती है।जैसे हिन्दू धर्म में देवी लक्ष्मी का मान है और उनकी पूजा होती है वैसे ही उनके वाहन उल्लू को भी काफी शुभ माना जाता है। लेकिन क्या आप जानते है आखिर उल्लू को ही माँ लक्ष्मी के वाहन के तौर पर क्यों पूजा जाता है। प्रत्येक देवी और देवता का एक वाहन होता है। वाहनों का महत्व भी काफी अधिक होता है तो जानते है की माता लक्ष्मी ने उल्लू को अपना वाहन किस प्रकार चुना इसके लिए एक कथा प्रचलित है।बेशक किसी मुर्ख व्यक्ति की तुलना उल्लू से करते है। लेकिन उल्लू को सबसे बुद्धिमान निशाचारी प्राणी होता है। उल्लू को भारतीय संस्कृति में शुभता और धन संपत्ति का प्रतीक के तौर पर विख्यात है।
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उल्लू कैसे बना लक्ष्मी का वाहन : प्राणी जगत की संरचाना करने के बाद एक रोज सभी देवी-देवता धरती पर विचार मंथन के लिए आये। जब पशु-पक्षियों ने उन्हें पृथ्वी पर घुमते हुए देखा तो उन्हें अच्छा नहीं लगा और वह सभी एकत्रित होकर उनके पास गए और बोले आपके द्वारा उत्पन्न होने पर हम धन्य हुए हैं। हम आपको धरती पर जहां चाहेंगे वहां ले चलेंगे। कृपया आप हमें वाहन के रूप में चुनें और हम पर अपनी अस्सम कृपा प्रकट करें।
देवी-देवताओं ने उनकी बात पर विचार किया और फिर एक -एक पशु -पक्षी को अपने वाहन के रूप में चुना। जब लक्ष्मीजी की बारी आई तब वह असमंजस में पड़ गई किस पशु-पक्षी को अपना वाहन चुनें। इस बीच पशु-पक्षियों के बीच विवाद पैदा होगया , सब चाहते थे की माता लक्ष्मीजी के वाहन के तौर पर उन्हें मान्यता मिले। इधर लक्ष्मीजी सोच विचार कर ही रही थी तब तक पशु पक्षियों में लड़ाई होने लगी गई।
इस पर लक्ष्मीजी ने उन्हें चुप कराया और कहा कि प्रत्येक वर्ष कार्तिक अमावस्या के दिन मैं पृथ्वी पर विचरण करने माता पधारती है। उस दिन माँ लक्ष्मी यह निर्णय लेगी की किस पशु-पक्षी को अपना वाहन चुनें। कार्तिक अमावस्या के रोज सभी पशु-पक्षी आंखें बिछाए लक्ष्मीजी की राह निहारने लगे। रात्रि के समय जैसे ही लक्ष्मीजी धरती पर पधारी उल्लू ने अंधेरे में अपनी तेज नजरों से उन्हें देखा और तीव्र गति से उनके समीप पंहुच गया और उनसे प्रार्थना करने लगा की आप मुझे अपना वाहन के तौर पर चुनें। माँ लक्ष्मीजी ने चारों ओर देखा उन्हें कोई भी पशु या पक्षी वहां नजर नहीं आया। और वो उल्लू की प्रार्थना से खुश होकर उल्लू को अपना वाहन स्वीकार कर लिया। तभी से उन्हें उलूक वाहिनी के तौर पर पूजा जाता है।

















