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पढ़िये, क्या है कांग्रेस और राहुल की मजबूरी?

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आज की तारीख में कांग्रेस की सबसे बड़ी मजबूरी अगर कोई है तो वो हैं राहुल गांधी और राहुल गांधी की सबसे बड़ी मजबूरी अगर कुछ है तो वो है ‘विदेश यात्रा’। आप कहेंगे वो कैसे? तो देखिए- भले ही पूरा देश राहुल गांधी को पप्पु मानता हो पर कांग्रेस पार्टी उन्हें भारत का भावी प्रधानमंत्री मानती है। लेकिन कांग्रेस की करनी से ऐसा जान पड़ता है कि दरअसल वो भी राहुल गांधी को पप्पु ही मानते हैं, अगर ऐसा नहीं है तो राहुल गांधी को अब तक अध्यक्ष क्यों नहीं बनाया गया है? इसके पीछे कुछ इस तरह की संभावनाएं हो सकती हैं-

राहुल गांधी भले ही गांधी परिवार का वारिस होने के नाते कांग्रेस की तरफ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बना दिए गए हों लेकिन उनकी मां सोनिया और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को ये अच्छी तरह से मालूम है कि अगर राहुल को पार्टी अध्यक्ष बना दिया जाएगा तो वो कुछ बेवकुफाना कदम उठा सकते हैं, जिससे मोदी और शाह को कांग्रेस मुक्त भारत करने में और भी ज्यादा मदद मिल जाएगी। पार्टी का एक धड्डा है जो कि राहुल गांधी को नेता के लायक मानता ही नहीं हैं और ये बात कई बार खुलकर सामने आ चुकी है। इसलिए भी सोनिया राहुल को अभी अध्यक्ष बनाने के पक्ष में नहीं हैं। इसके पीछे सोनिया के सबसे विश्वस्त और राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल की रणनीति भी हो सकती है, क्योंकि उन्हें मालूम है कि सोनिया युग ढलते ही मेरी अहमियत खत्म हो जाएगी। इसलिए खबरों के मुताबिक राहुल गांधी ने हाल ही में राज्यसभा सीट जीतने के बाद अहमद पटेल को बधाई भी नहीं दी थी। एक वजह राजनीति को लेकर राहुल की उदासीनता भी हो सकती है। जैसा कि विपक्ष और लोगों का आरोप है। लेकिन राहुल गांधी का कांग्रेस अध्यक्ष बनना तो तय है। क्योंकि यही है कांग्रेस की मजबूरी-

कांग्रेस की मजबूरी

अब तक कांग्रेस पार्टी ने गांधी-नेहरू परिवार से इतर तीन लोगों को प्रधानमंत्री बनाया है, जिनमें लाल बहादुर शास्त्री, पी. वी. नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह शामिल हैं। यहां ध्यान देने योग्य बात ये है कि मनमोहन सिंह के वक्त को छोड़ दिया जाए तो (जो कि 2004-2014 तक प्रधानमंत्री रहे) शास्त्री जी और नरसिम्हा राव के वक्त गांधी परिवार में कोई सर्वमान्य चेहरा नहीं था। हालांकि राव के समय में सोनिया थीं, पर उस वक्त वो राजनीति में पूरी तरह सक्रिय नहीं थी और इतनी ताकतवर भी नहीं थीं। वहीं मनमोहन सिंह के समय में तथाकथित रूप से सोनिया ही सारे अहम फैसले लिया करती थीं।

तत्कालीन कांग्रेस पार्टी में गांधी परिवार को छोड़कर कोई भी चेहरा अगर सामने आता है तो पार्टी निश्चित रूप से दो फाड़ हो सकती है। क्योंकि एक तरफ जहां भाजपा बेहद ही मजबूत स्थिति में है वहीं देश में कांग्रेस की स्थिति किसी क्षेत्रिय दल की तरह हो गई है जो कभी बंगाल में लेफ्ट के सहारे तो यूपी में सपा के साथ तो बिहार में महागठबंधन की पीठ पर सवारी को मजबूर है। ऐसे में राहुल अयोग्य होते हुए भी (जैसा कि लोग कहते हैं) कांग्रेस के नेता हैं। तो यही है कांग्रेस की मजबूरी राहुल पप्पु होते हुए भी कम से कम सर्वमान्य तो हैं।

राहुल की मजबूरी

अब राहुल की मजबूरी ये है कि वो इस साल अब तक 8 बार विदेश यात्रा कर चुके हैं। फिलहाल तो राहुल नॉर्वे के चार दिवसीय दौरे से लौटे भी नहीं हैं कि सितम्बर में उनका दो हफ्ते का अमेरिका के लिए दौरा तय है। अब बात करते हैं इसके पीछे की वजहों के बारे में- ये ठीक है कि लोग राहुल को पप्पु बुलाते हैं, लेकिन इसमें भी कोई संदेह नहीं कि वो लगातार हाथ-पांव मार रहे हैं इस छवि से बाहर निकलने के लिए। देश में जहां जनता उनको स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है वहीं पार्टी में उनकी मां उन्हें पूरी जिम्मेदारी देना नहीं चाहतीं क्योंकि उनको राहुल पर अब भी भरोसा नहीं है कि वो पार्टी को अच्छे से संभाल सकते हैं। ऐसे में बेचारा राहुल आखिर क्या करें- वो विदेश दौरे पर ही चले जाते हैं और अपनी समझ के मुताबिक पार्टी और मम्मी के आगे अपनी क्षमता को पेश करने की कोशिश करते हैं। अब देखिए ना राहुल अपने पारिवारिक मित्र सैम पित्रोदा के साथ अमेरिका यात्रा करेंगे और कैलिफोर्निया में छोटे निवेशकों, वेंचर कैपिटलिस्टों तथा अप्रवासी भारतीयों के साथ भी बैठकें करेंगे। ये क्या कम बड़ी बात है? और वो वहां भला क्यों दिमाग लगाएं जहां लोग उन्हें पप्पु बुलाते हैं। प्रधानमंत्री बनने की बात रही तो बस इंतजार है देश में बीजेपी के कमजोर होने का, फिर तो लोग इन्हें स्वीकार करें ना करें पार्टी तो स्वीकार कर ही लेगी। हो ना हो राहुल को किसी ने ये बता दिया होगा कि आपके ऊपर ज्यादा चर्चा तब होती है जब आप विदेश में रहते हो। तो वो निकल लेते हैं बीच-बीच में विदेश। वैसे भी यहां उनकी चलती कहां है लोग गलतियां अलग से ढूंढ लेते हैं। इस तरह देखा जाए तो ये सिद्ध हुआ कि विदेश यात्रा राहुल की मजबूरी है।

 

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