गांधी जी ने धर्म ‌का क्या अर्थ बताया?

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गांधी जी ने धर्म ‌का क्या अर्थ बताया?

धर्म की संकल्पना को लेकर गांधी की समझ कितनी स्पष्ट और समाहक थी, उसकी एक बानगी देखिये – ‘यह धर्म का सौभाग्य अथवा दुर्भाग्य है कि वह कोई सत्तारोपित मत नहीं है. अतः अपने आपको किसी गलतफहमी से बचाने के लिए मैंने कहा कि सत्य और अहिंसा मेरा धर्म है. यदि मुझसे हिन्दू धर्म की व्याख्या करने के लिए कहा जाय तो मैं इतना ही कहूंगा- अहिंसात्मक साधनों द्वारा सत्य की खोज. कोई मनुष्य ईश्वर में विश्वास न करते हुए भी अपने आप को हिंदू कह सकता है.

सत्य की अथक खोज का दूसरा नाम हिंदू-धर्म है.यदि आज वह मृतप्राय, निष्क्रिय अथवा विकासशील नहीं रह गया है तो इसलिये की हम थक कर बैठ गए हैं और ज्यों ही यह थकावट दूर हो जायेगी त्यों ही हिन्दू धर्म संसार पर ऐसे प्रखर तेज़ के साथ छा जायेगा जैसा कदाचित पहले कभी नहीं हुआ. अतः निश्चित रूप से हिन्दू-धर्म सबसे अधिक सहिष्णु धर्म है.’

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‘यंग इंडिया’ में उन्होंने लिखा भी कि,’सिवाय अपने जीवन के और किसी अन्य ढंग से हिन्दू धर्म की व्याख्या करने के योग्य मैं खुद को नहीं मानता.’ मुझे नहीं लगता कि गांधी के अलावा किसी और में यह स्वीकार करने और कहने का साहस था कि,’अभी जब तक हम गुलाम हैं, तब तक हम सभी मुख्यतः शूद्र ही हैं.’

गांधी खुद कहते हैं कि ‘हिन्दू धर्म सभी लोगों को अपने-अपने धर्म के अनुसार ईश्वर की उपासना करने को कहता है, और इसीलिए इसका किसी धर्म से कोई झगड़ा नहीं है. हिन्दू धर्म अनेक युगों का विकास फल है. हिन्दू लोगों की सभ्यता बहुत प्राचीन है और इसमें अहिंसा समाई हुई है.

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ऐसे में ज़ाहिर है कि खुले दिमाग और व्यापक दृष्टिकोण वाले गांधी को बिना जाने-समझे मूढ़ बुद्धि और अज्ञानी लोग आसानी से स्वीकार नहीं करेंगे. वे स्वीकार करें भी तो कैसे? हमें समझना ही होगा कि महात्मा गांधी का जीवन-दर्शन और हिंदुत्त्व का उनका स्वरूप भी इसी तरह का है. उनका हिंदुत्त्व जब हमें खुद परख लेगा, तो वो भी हमें स्वीकार कर लेगा. तब अपनी तमाम मूढ़ताओं को नकार कर हम उसे आत्मसात कर सकेंगे. और शायद तभी हम खुले मन और मुक्तकंठ से स्वीकार कर पाएंगे कि गांधी अब तक के सभी हिंदुओं से थोड़ा ज्यादा हिन्दू थे.

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