होली के त्योहार के पीछे के वैज्ञानिक कारण क्या हैं ?
भारत में होली का त्योहार बड़ी ही धूम-धाम से मनाया जाता है. होली के त्योहार को भाईचारे का प्रतीक भी माना जाता है.
भारत में होली का त्योहार बड़ी ही धूम-धाम से मनाया जाता है. होली के त्योहार को भाईचारे का प्रतीक भी माना जाता है. इस दिन सभी लोग अपने रिश्तेदारों और परिवार वालों के साथ होली खेलते हैं तथा एक दूसरे को रंग लगाते हैं. होली के त्योहार को आपसी एकता का प्रतीक भी माना जाता है. इस दिन होलिका दहन भी किया जाता है. इसके पीछे एक पौराणिक कथा है. इस त्योहार को मनाने के पीछे सिर्फ पुरानी रिति-रिवाज ही नहीं बल्कि कुछ वैज्ञानिक कारण भी हैं.

वैज्ञानिक कारण की बात करें, तो जब होली का त्योहार मनाया जाता है को उस समय शरद ऋतु की समाप्ति होती है तथा बसंत ऋतु के आगमन की शुरूआत होती है. इस समय का मौसम पर्यावरण और शरीर में बैक्टीरिया की वृद्धि को बढ़ा देता है लेकिन जब होलिका दहन किया जाता है , तो उससे करीब 145 डिग्री फारेनहाइट तक तापमान बढ़ता है. परंपरा के अनुसार जब लोग जलती होलिका की परिक्रमा करते हैं तो होलिका दहन से निकलता ताप शरीर और आसपास के पर्यावरण में मौजूद बैक्टीरिया को नष्ट कर देता है. इससे बैक्टीरिया खत्म हो जाता है. होलिका दहन को पर्यावरण के लिए बहुत ही लाभदायक माना जाता है.

होली पर शरीर पर ढाक के फूलों से तैयार किया गया रंगीन पानी, विशुद्ध रूप में अबीर और गुलाल डालने से शरीर पर इसका सुकून देने वाला प्रभाव पड़ता है और यह शरीर को ताजगी प्रदान करता है. जिससे मौसम के बदलाव के कारण आए आलस्य से मुक्ति मिलती है.
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होलिका दहन को असत्य पर सत्य की जीत के तौर पर भी देखा जा सकता है, क्योंकि इस दिन भक्त पहलाद् की बुआ होलिका उसको मारने के लिए अग्नि में बैठी थी. लेकिन सत्य की जीत हुई और भक्त पहलाद बच गया तथा उसकी बुआ होलिक जल जाती है.



