दादाभाई नैरोजी: जिन्होंने ब्रिटिश संसद से उठाई भारत की गरीबी की आवाज़, लड़कियों की शिक्षा के लिए झेला विरोध
30 जून 1917 को बंबई (अब मुंबई) में भारतीय राजनीति का एक युग समाप्त हुआ था — जब 'ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया' दादाभाई नैरोजी ने अंतिम सांस ली। राजनेता, शिक्षाविद, उद्योगपति और समाज सुधारक के रूप में उनकी
30 जून 1917 को बंबई (अब मुंबई) में भारतीय राजनीति का एक युग समाप्त हुआ था — जब 'ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया' दादाभाई नैरोजी ने अंतिम सांस ली। राजनेता, शिक्षाविद, उद्योगपति और समाज सुधारक के रूप में उनकी विरासत आज भी भारतीय इतिहास में अमिट है।
पारसी परिवार से उठकर बौद्धिकता के स्तंभ बने
IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, 4 सितंबर 1825 को एक पारसी परिवार में जन्मे दादाभाई नैरोजी की प्रारंभिक शिक्षा एलफिंस्टन इंस्टीट्यूट स्कूल में हुई। आगे चलकर उन्होंने प्रोफेसर के रूप में सेवाएँ दीं और बड़ोदरा के महाराजा का संरक्षण पाते हुए उस रियासत में दीवान का दायित्व भी निभाया। भारतीय राजनीति में वे बौद्धिकता के प्रतीक माने जाते थे।
1849 में लड़कियों के लिए स्कूल — रूढ़िवाद से टकराए, जीते भी
दादाभाई नैरोजी ने वर्ष 1849 में लड़कियों की शिक्षा के लिए स्कूल की स्थापना की। यह कदम उस दौर के रूढ़िवादी पुरुषों को रास नहीं आया और उन्हें कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। लेकिन उनमें अपनी बात मनवाने की अद्भुत कला थी — वे परिस्थितियों की दिशा बदलना जानते थे। नतीजा यह रहा कि पाँच वर्ष के भीतर ही उस स्कूल में छात्राओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हो गई। इसी के बाद उन्होंने लैंगिक समानता की माँग को भी मुखर रूप से उठाया।
ब्रिटेन की समृद्धि ने जगाया सवाल — भारत पिछड़ा क्यों?
वर्ष 1855 में जब दादाभाई नैरोजी पहली बार ब्रिटेन गए, तो वहाँ की संपन्नता देखकर स्तब्ध रह गए। उनके मन में एक ही प्रश्न उठा — उनका देश भारत इतना पिछड़ा क्यों है? इस जिज्ञासा ने उन्हें दो दशकों तक गहन आर्थिक विश्लेषण की राह पर डाल दिया। इसी शोध के बल पर उन्होंने यह उद्घाटन किया कि अंग्रेज किस तरह भारत की संपत्ति को लूटकर ब्रिटेन ले जा रहे हैं — यह उनका सबसे ऐतिहासिक योगदान माना जाता है।
ब्रिटिश संसद में पहुँचने वाले पहले भारतीय
भारत की गरीबी को ब्रिटेन के सत्ता-गलियारों तक पहुँचाने की महत्वाकांक्षा ने उन्हें यूके हाउस ऑफ कॉमन्स तक का सफर तय कराया। वर्ष 1892 से 1895 तक वे इस सदन के सदस्य रहे और ऐसा करने वाले पहले भारतीय बने। सांसद के रूप में उन्होंने भारतीयों की पीड़ा और समस्याएँ ब्रिटिश सरकार व वहाँ की जनता के सामने निर्भीकता से रखीं। ब्रिटेन में महिलाओं के अधिकारों सहित कई अहम मुद्दों पर भी उन्होंने अपनी आवाज़ बुलंद की।
30 जून को उनकी पुण्यतिथि पर देश उन्हें स्मरण करता है। दादाभाई नैरोजी का योगदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक सुधार — दोनों के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है।
इनपुट: IANS



