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तमिलनाडु: होसुर वन क्षेत्र में तीन हाथी गलियारों को मिली आधिकारिक मान्यता

तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच हाथियों की मौसमी आवाजाही को सुरक्षित और आसान बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के अनुसार, तमिलनाडु सरकार ने होसुर वन प्रभाग…

तमिलनाडु: होसुर वन क्षेत्र में तीन हाथी गलियारों को मिली आधिकारिक मान्यता
(फोटो: IANS)

तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच हाथियों की मौसमी आवाजाही को सुरक्षित और आसान बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के अनुसार, तमिलनाडु सरकार ने होसुर वन प्रभाग में कावेरी उत्तरी वन्यजीव अभयारण्य के भीतर तीन हाथी गलियारों को आधिकारिक तौर पर अधिसूचित कर दिया है।

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यह फैसला हाथियों के प्राकृतिक आवासों के बीच संपर्क को बेहतर बनाने और उनके पारंपरिक रास्तों को संरक्षित करने के उद्देश्य से लिया गया है। ये गलियारे मानसून, पानी, चारे की उपलब्धता और प्रजनन संबंधी जरूरतों के आधार पर हाथियों के झुंडों द्वारा नियमित रूप से उपयोग किए जाते हैं। पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन और वन विभाग की अतिरिक्त मुख्य सचिव, ककरला उषा द्वारा जारी आदेश के अनुसार, इन गलियारों की पहचान हाथियों की आबादी को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण मानी गई है।

गलियारों का विवरण और क्षेत्रफल

अधिसूचना में तीन प्रमुख गलियारों को मान्यता दी गई है, जो कुल मिलाकर 10,300 हेक्टेयर से अधिक के आरक्षित वन और अभयारण्य क्षेत्र को कवर करते हैं:

  • जवालागिरी-पनाई-अंचेट्टी: यह 20.90 किलोमीटर लंबा सबसे बड़ा गलियारा है, जिसका क्षेत्रफल 6,881.47 हेक्टेयर है।
  • जवालागिरी-उलिबांडा-थग्गाट्टी: यह गलियारा 18.50 किलोमीटर के दायरे में फैला है और 3,241.53 हेक्टेयर भूमि को कवर करता है।
  • बिल्लिकल-जवालागिरी: यह 2.20 किलोमीटर लंबा सबसे छोटा गलियारा है, जो लगभग 196 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला है।

अधिसूचना का आधार और प्रभाव

यह सरकारी अधिसूचना मद्रास उच्च न्यायालय के अंतरिम निर्देशों और इस उद्देश्य के लिए गठित समितियों की सिफारिशों के आधार पर जारी की गई है। चूंकि ये सभी गलियारे पहले से ही आरक्षित वन या वन्यजीव अभयारण्य के अंतर्गत आते हैं, इसलिए इस अधिसूचना से भूमि के कानूनी वर्गीकरण या स्थानीय लोगों पर किसी अतिरिक्त प्रतिबंध का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

हालांकि, इस आधिकारिक मान्यता से इन महत्वपूर्ण मार्गों के संरक्षण को प्राथमिकता मिलेगी। उम्मीद है कि इससे वन अधिकारियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित होगा और भविष्य में विकास कार्यों से हाथियों की आवाजाही में आने वाली बाधाओं को रोकने में मदद मिलेगी। यह कदम मानव-हाथी संघर्ष को कम करने और इन मार्गों के क्षतिग्रस्त हिस्सों को पुनर्स्थापित करने की दिशा में भी सहायक होगा।

इनपुट: IANS

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News4Social नेशनल डेस्क

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