पैकेटबंद खाने-पीने की चीजों पर 'लाल चेतावनी': FSSAI ने सुप्रीम कोर्ट में पेश किया प्रस्ताव
अगर खाने-पीने के पैकेटबंद सामान में चीनी, नमक या फैट (वसा) की मात्रा तय सीमा से ज़्यादा है, तो अब उस पर लाल रंग का चेतावनी लेबल लगाना अनिवार्य हो सकता है। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण…
अगर खाने-पीने के पैकेटबंद सामान में चीनी, नमक या फैट (वसा) की मात्रा तय सीमा से ज़्यादा है, तो अब उस पर लाल रंग का चेतावनी लेबल लगाना अनिवार्य हो सकता है। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने सुप्रीम कोर्ट में यह प्रस्ताव पेश किया है, जिसका मकसद ग्राहकों को सेहत के लिए बेहतर चुनाव करने में मदद करना है।
समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, FSSAI ने अदालत को बताया कि इस चेतावनी लेबल पर 'ज़्यादा वसा वाला', 'ज़्यादा चीनी वाला' या 'ज़्यादा नमक वाला' जैसे स्पष्ट संदेश लिखे होंगे। इससे लोग आसानी से समझ सकेंगे कि वे जो उत्पाद खरीद रहे हैं, उसमें सेहत पर असर डालने वाली कौन-सी चीज़ अधिक मात्रा में है।
सुप्रीम कोर्ट की सख़्ती और FSSAI का जवाब
यह मामला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की एक याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया, जिसमें वे पश्चिमी देशों की तरह भारत में भी पैकेट के सामने चेतावनी लेबल लगाने की माँग कर रहे हैं। इस महीने की शुरुआत में हुई एक सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI को इन लेबलों को लागू करने की प्रक्रिया में तेज़ी लाने का निर्देश दिया था।
पिछली सुनवाई में, न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने इस मामले में हो रही लंबी देरी पर नियामक संस्था की कड़ी आलोचना की थी। पीठ ने FSSAI की धीमी गति पर असंतोष जताते हुए सवाल किया था कि क्या वह वास्तव में भारतीय नागरिकों के स्वास्थ्य को प्राथमिकता देती है। अदालत ने चेतावनी दी थी कि अगर संस्था स्वतंत्र रूप से काम करने में विफल रही तो न्यायिक आदेश जारी किए जाएँगे।
कंपनियों का विरोध और अदालत का रुख
रिपोर्ट के मुताबिक, नेस्ले, पेप्सिको और कोका-कोला जैसी कई बड़ी खाद्य कंपनियाँ इस कदम का विरोध कर रही हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि इससे उनकी बिक्री पर असर पड़ सकता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि ऐसे लेबल पारंपरिक भारतीय स्नैक्स पर गलत असर डाल सकते हैं। पीठ ने स्पष्ट किया कि व्यावसायिक हितों को सार्वजनिक स्वास्थ्य से ऊपर नहीं रखा जा सकता।
अदालत ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि नागरिकों, खासकर बच्चों को मोटापे जैसी बीमारियों के खतरे से बचाने के लिए पोषण संबंधी पारदर्शी जानकारी देना बेहद ज़रूरी है। साथ ही, FSSAI को एक निश्चित रूपरेखा तैयार करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया गया है।
इनपुट: IANS



