छत्तीसगढ़: कभी नक्सलवाद का गढ़ रहे सुकमा के गोगुंडा में विकास की दस्तक, पर चुनौतियां बाकी
छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले का गोगुंडा इलाका, जो कभी नक्सलियों का गढ़ माना जाता था और जहाँ सुरक्षा बलों का पहुंचना भी दूभर था, अब विकास और बदलाव की एक नई कहानी लिख रहा है। समाचार एजेंसी IANS की एक…
छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले का गोगुंडा इलाका, जो कभी नक्सलियों का गढ़ माना जाता था और जहाँ सुरक्षा बलों का पहुंचना भी दूभर था, अब विकास और बदलाव की एक नई कहानी लिख रहा है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, सड़क, बिजली, स्कूल और आंगनबाड़ी जैसी बुनियादी सुविधाओं के पहुंचने से स्थानीय लोगों का जीवन तो आसान हुआ है, लेकिन इस इलाके में सुरक्षा की चुनौतियां अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं।
एक समय था जब गोगुंडा का नाम सिर्फ नक्सली गतिविधियों और दहशत के लिए जाना जाता था। आईईडी और नक्सलियों द्वारा छिपाए गए हथियारों (डंप) के कारण आम जन-जीवन लगभग असंभव था। इन हालात में सुरक्षा बलों को भी कई बार हेलीकॉप्टर का सहारा लेना पड़ता था।
विकास की शुरुआत और मौजूदा स्थिति
इस क्षेत्र में बदलाव की प्रक्रिया तब शुरू हुई जब सीआरपीएफ की 74वीं बटालियन ने यहां अपना कैंप स्थापित किया। कैंप की स्थापना के बाद ही सड़क निर्माण का काम शुरू हो सका और बिजली पहुंची, जिससे स्कूल और आंगनबाड़ी जैसी जरूरी सुविधाएं भी ग्रामीणों तक पहुंच पाईं। सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने से ग्रामीणों में नक्सलियों का खौफ भी धीरे-धीरे कम हो रहा है। सीआरपीएफ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने IANS को बताया कि 2014 की तुलना में अब हालात काफी बेहतर हैं और संयुक्त टीमों के प्रयास से विकास तेजी से हो रहा है।
सुरक्षा से जुड़ी अनसुलझी पहेलियां
बुनियादी सुविधाओं के पहुंचने के बावजूद गोगुंडा में चुनौतियां बरकरार हैं। इलाके की भौगोलिक स्थिति बेहद जटिल है। आज भी सीआरपीएफ कैंप तक किसी वाहन से नहीं पहुंचा जा सकता, यहां तक कि बाइक ले जाना भी संभव नहीं है। जवानों और ग्रामीणों को पहाड़ पर चढ़कर ही कैंप तक पहुंचना पड़ता है। जवानों के मुताबिक, खतरा अभी टला नहीं है और हर हफ्ते आईईडी मिलने की घटनाएं सामने आती रहती हैं। पुलिस और नक्सली सूत्रों का भी मानना है कि पूरे इलाके में अब भी बड़ी संख्या में आईईडी जमीन के नीचे दबे हो सकते हैं।
यह पहला मौका था जब IANS की टीम सुरक्षा बलों की गतिविधियों और हो रहे बदलावों को कवर करने के लिए इस हाई-रिस्क जोन में पहुंची। जवानों ने मीडिया टीम का हौसला बढ़ाया और इस बात पर जोर दिया कि नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा के साथ विकास को बढ़ावा देकर ही स्थायी शांति लाई जा सकती है।
इनपुट: IANS



