मंगलवार, 1 सितम्बर 2026 · नई दिल्ली
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सोन नदी जल समझौता: सरयू राय ने उठाया सवाल, 'झारखंड को एक बूंद भी अतिरिक्त पानी नहीं मिला'

झारखंड और बिहार के बीच दशकों पुराने सोन नदी जल विवाद पर हुए नए समझौते को लेकर राज्य के पूर्व मंत्री और विधायक सरयू राय ने गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने 31 अगस्त को हुए इस जल बंटवारा समझौते को 'नई…

सोन नदी जल समझौता: सरयू राय ने उठाया सवाल, 'झारखंड को एक बूंद भी अतिरिक्त पानी नहीं मिला'
(फोटो: IANS)

झारखंड और बिहार के बीच दशकों पुराने सोन नदी जल विवाद पर हुए नए समझौते को लेकर राज्य के पूर्व मंत्री और विधायक सरयू राय ने गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने 31 अगस्त को हुए इस जल बंटवारा समझौते को 'नई बोतल में पुरानी शराब' बताते हुए दावा किया है कि इससे झारखंड को कोई अतिरिक्त पानी नहीं मिला है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, राय का कहना है कि झारखंड को आवंटित 20 लाख एकड़ फीट पानी का प्रावधान 1973 के बाणसागर समझौते में ही कर दिया गया था।

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जमशेदपुर पश्चिम से विधायक सरयू राय ने कहा कि 31 अगस्त का समझौता कोई नया जल आवंटन नहीं है, बल्कि यह लगभग पांच दशक पुराने प्रावधानों को ही दोहराता है। उन्होंने बिहार और झारखंड के मुख्यमंत्रियों को पुराने विवाद पर नए सिरे से पहल करने के लिए धन्यवाद दिया, लेकिन समझौते के प्रावधानों पर स्पष्टता की मांग की।

समझौते का ऐतिहासिक संदर्भ

सरयू राय ने ऐतिहासिक तथ्यों का हवाला देते हुए बताया कि 1973 के बाणसागर समझौते के तहत अविभाजित बिहार को इंद्रपुरी बराज पर कुल 7.75 मिलियन एकड़ फीट (MAF) पानी आवंटित हुआ था। इसमें से 5 MAF पानी लगभग 150 साल पुराने सोन नहर क्षेत्र के लिए आरक्षित था। उन्होंने विस्तार से बताया कि शेष 2.75 MAF (यानी 27.50 लाख एकड़ फीट) पानी में से ही झारखंड का 20 लाख एकड़ फीट का हिस्सा तय हुआ था, जबकि बाकी बिहार को मिलना था।

झारखंड के हिस्से का पानी कहाँ से?

राय के अनुसार, झारखंड को मिला 20 लाख एकड़ फीट पानी मुख्य रूप से उसकी अपनी नदियों से आता है। इसमें कनहर नदी से लगभग 4.32 लाख एकड़ फीट और उत्तरी कोयल नदी से 15.627 लाख एकड़ फीट पानी शामिल है। इसके अलावा, उन स्वतंत्र क्षेत्रों का पानी भी है जो सीधे सोन नदी में जाकर मिलते हैं। उन्होंने कहा कि इन नदियों पर योजनाएं पूरी न होने के कारण झारखंड अपने हिस्से के पानी का पूरा उपयोग नहीं कर पाया है।

अधूरी परियोजनाएं और अस्पष्ट प्रावधान

पूर्व मंत्री ने कई लंबित परियोजनाओं का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि कदवन गांव के पास एक बांध की योजना थी, जिसका शिलान्यास 1980 में तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्र ने किया था, लेकिन वह आज तक पूरी नहीं हुई। राय ने आशंका जताई कि नए समझौते में संभवतः इसी कदवन बांध के निर्माण का प्रावधान है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि इसके बदले बिहार को झारखंड से क्या मिलेगा या इससे उत्पन्न होने वाली पनबिजली का बंटवारा कैसे होगा।

सरयू राय ने सुझाव दिया कि दोनों राज्य सरकारों को केंद्र से लंबित परियोजनाओं को पूरा करने के लिए वित्तीय सहायता मांगनी चाहिए, क्योंकि इन योजनाओं के अटकने में केंद्र और केंद्रीय जल आयोग की भी भूमिका रही है।

इनपुट: IANS

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News4Social नेशनल डेस्क

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