शुक्रवार, 11 सितम्बर 2026 · नई दिल्ली
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त्वचा की टीबी भी हो सकती है दवा-बेअसर, KGMU के शोध में चिंताजनक खुलासा

आमतौर पर टीबी को फेफड़ों की बीमारी माना जाता है, लेकिन इसका बैक्टीरिया त्वचा समेत शरीर के किसी भी हिस्से को प्रभावित कर सकता है। अब लखनऊ के किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (KGMU) के एक नए शोध ने…

त्वचा की टीबी भी हो सकती है दवा-बेअसर, KGMU के शोध में चिंताजनक खुलासा
(फोटो: IANS)

आमतौर पर टीबी को फेफड़ों की बीमारी माना जाता है, लेकिन इसका बैक्टीरिया त्वचा समेत शरीर के किसी भी हिस्से को प्रभावित कर सकता है। अब लखनऊ के किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (KGMU) के एक नए शोध ने त्वचा की टीबी (स्किन टीबी) को लेकर एक गंभीर चिंता जताई है। इस अध्ययन के अनुसार, स्किन टीबी के मरीज़ों में दवा-प्रतिरोधी टीबी (Drug-Resistant TB) का खतरा बढ़ रहा है, यानी उन पर टीबी की सामान्य दवाएं बेअसर साबित हो रही हैं।

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यह अध्ययन इंडियन जर्नल ऑफ डर्मेटोलॉजी, वेनेरोलॉजी एंड लेप्रोलॉजी (IDGVL) में प्रकाशित हुआ है। समाचार एजेंसी IANS से मिली जानकारी के मुताबिक, इस शोध में पाया गया कि कुछ मरीज़ों पर टीबी के इलाज की सबसे कारगर दवाएं भी काम नहीं कर रही थीं। यह स्थिति इलाज को बेहद जटिल और लंबा बना देती है।

अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष

KGMU के त्वचा रोग विभाग ने 2019 से 2022 के बीच 20 से 40 साल की उम्र के 54 मरीज़ों पर यह शोध किया। इनमें से 7 मरीज़ों में दवा-प्रतिरोधी टीबी की पुष्टि हुई। राहत की बात यह रही कि इलाज शुरू होने के करीब एक महीने में ही इन मरीज़ों की हालत सुधरने लगी और कोर्स पूरा करने वालों के त्वचा के घाव पूरी तरह भर गए।

विश्लेषण में सामने आया कि दवा-प्रतिरोधी पाए गए 7 मरीज़ों में से 6 पर टीबी की सबसे असरदार दवा का कोई प्रभाव नहीं हो रहा था, जिसके बाद उन्हें बहु दवा-प्रतिरोधी (MDR) टीबी की दवाएं दी गईं। वहीं, एक अन्य मरीज़ पर एक दूसरी मुख्य दवा बेअसर थी। इन सात मरीज़ों में चार अलग-अलग तरह की स्किन टीबी पाई गई, जिनमें ल्यूपस वल्गैरिस, स्क्रोफूलोडरमा, ट्यूबरकुलर एब्सेस और ट्यूबरकुलर चैंक्र शामिल थे।

सही जांच क्यों है ज़रूरी?

विशेषज्ञों के अनुसार, स्किन टीबी में बैक्टीरिया की संख्या कम होने के कारण पारंपरिक कल्चर जांच से इसकी पहचान मुश्किल होती है। KGMU के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर ड्रग रेजिस्टेंट टीबी के संस्थापक प्रभारी प्रो. सूर्यकांत ने कहा, "स्किन टीबी को केवल त्वचा तक सीमित बीमारी मानकर दवा-प्रतिरोध की संभावना को नजरअंदाज करना खतरनाक साबित हो सकता है।" उन्होंने जीन एक्सपर्ट, कल्चर और ड्रग ससेप्टिबिलिटी टेस्टिंग (DST) जैसी जांचों को अनिवार्य बताया।

विश्वविद्यालय की प्रोफेसर डॉ. पारुल वर्मा के मुताबिक, दवा-प्रतिरोधी स्किन टीबी के लक्षण भी सामान्य स्किन टीबी जैसे ही होते हैं, इसलिए बिना आधुनिक जांच के दोनों में फर्क करना नामुमकिन है। उन्होंने चेताया कि अगर सही समय पर इसका पता न चले तो संक्रमण छाती और दिमाग तक फैल सकता है, जिससे स्थिति जानलेवा हो सकती है।

भविष्य की तकनीक और सावधानियां

त्वचा रोग विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. स्वास्तिका सुविर्या ने बताया कि भारत में टीबी के जीवाणुओं में ऐसे जेनेटिक बदलाव देखे गए हैं, जिन्हें सामान्य मॉलिक्यूलर टेस्ट पकड़ नहीं पाते। उनके अनुसार, भविष्य में होल जीनोम सीक्वेंसिंग (WGS) जैसी उन्नत तकनीकें दवा-प्रतिरोधी टीबी की सटीक पहचान में अहम भूमिका निभा सकती हैं।

वहीं, श्वसन रोग विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. ज्योति बाजपेयी ने सलाह दी कि अगर त्वचा पर कोई घाव या अल्सर सामान्य इलाज से 4-6 हफ्तों में ठीक न हो, तो स्किन टीबी की जांच ज़रूर करानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि इलाज का कोर्स अधूरा छोड़ने पर डीआर-टीबी का खतरा बढ़ जाता है।

इनपुट: IANS

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News4Social टेक डेस्क

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