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भगवान श्री कृष्ण की नारायणी सेना कैसी कला से निपूर्ण थी?

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महाभारत का युद्ध सबसे भयानक युद्ध था। आज भी अगर कोई इस युद्ध के बारे में सुनता है तो उसके रोंगटे खड़े हो जाते है। इस युद्ध में अहम भूमिका निभाने वाले भगवान श्रीकृष्ण की नारायणी सेना सबसे भीषण प्रहारक सेना में से एक थी, बड़े -बड़े युद्धा भी नारायणी सेना का सामना करने से भयभीत होजाती थी। लेकिन क्या आप जानते है महाभारत काल के दौरान भगवान श्री कृष्ण की नारायणी सेना सबसे भयंकर प्रहारक सेना होने के पीछे क्या कारण था और वो ऐसे कैसे भयंकर प्रहारक सेना में तब्दील हो गई। आप जानकर हैरान हो जाएंगे की धरती पर सबसे पहले भगवान परशुराम ने मार्शल आर्ट को प्रचलित किया था और साथ ही प्रदान भी किया था। महर्षि अगस्त्य ने दक्षिणी कलारिप्पयतु (बिना शस्त्र के लड़ना) और परशुराम ने शस्त्र युक्त कलारिप्पयतु का विकास किया था। भगवान श्रीकृष्ण दोनों ही तरह के विद्या में निपूर्ण थे उन्हें पहले से इस खास विद्या का बोध था। उन्होंने इस विद्या को और अच्छे से विकसित किया और इसको एक नया नाम से विख्यात किया। इसे कलारिप्पयतु, कलारीपयट्टू या कालारिपयट्टू (kalaripayattu) के तौर पर विश्वभर में प्रख्यात हुआ।

जब श्रीकृष्ण कीउम्र 16 वर्ष की थी। इस विद्या के माध्यम से ही चाणूर और मुष्टिक जैसे मल्लों का नाश किया था मथुरा में दुष्ट रजक के सिर को हथेली के प्रहार से काट दिया था। जनश्रुतियों के अनुसार श्रीकृष्ण ने मार्शल आर्ट का विकास ब्रज क्षेत्र के वनों में किया था। डांडिया रास उसी का एक नृत्य रूप के तौर पर विख्यात है। कालारिपयट्टू विद्या के प्रथम आचार्य श्रीकृष्ण को ही माना जाता है। हालांकि इसके बाद इस विद्या को अगस्त्य मुनि ने प्रचारित किया था।

इस विद्या के कारण ही ‘नारायणी सेना’ भारत की सबसे भयंकर प्रहारक सेना बन गई थी। श्रीकृष्ण ने ही कलारिपट्टू की नींव रखी, जो बाद में बोधिधर्मन से होते हुए आधुनिक मार्शल आर्ट में विकसित हो गई थी। बोधिधर्मन के कारण ही यह विद्या चीन, जापान आदि बौद्ध राष्ट्रों में प्रचलित हुई। आज भी यह विद्या केरल और कर्नाटक जैसे राज्यों में काफी विख्यात है।

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