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सुल्तानगंज का श्रावणी मेला: जहाँ आस्था और अर्थव्यवस्था का होता है संगम, एक महीने की कमाई से चलता है साल भर का खर्च

बिहार के भागलपुर स्थित सुल्तानगंज में लगने वाला विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेला केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि एक विशाल आर्थिक महाकुंभ भी है। यह एक महीने का आयोजन स्थानीय अर्थव्यवस्था की…

सुल्तानगंज का श्रावणी मेला: जहाँ आस्था और अर्थव्यवस्था का होता है संगम, एक महीने की कमाई से चलता है साल भर का खर्च
(फोटो: IANS)

बिहार के भागलपुर स्थित सुल्तानगंज में लगने वाला विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेला केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि एक विशाल आर्थिक महाकुंभ भी है। यह एक महीने का आयोजन स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुका है, जिससे हजारों परिवारों को साल भर की आजीविका मिलती है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस मेले के दौरान होने वाला अरबों रुपये का कारोबार सुल्तानगंज और आसपास के क्षेत्रों के लिए जीवनरेखा का काम करता है।

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हर साल सावन के महीने में अजगैबीनाथ गंगाधाम में 25,000 से भी ज़्यादा अस्थायी दुकानें सज जाती हैं। इन दुकानों में पूजा सामग्री, कांवर और गेरुआ वस्त्रों से लेकर गंगा तट की साधारण मिट्टी तक बेची जाती है, जिससे करोड़ों का लेन-देन होता है। इस मेले का आर्थिक प्रभाव सिर्फ खुदरा व्यापार तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह पर्यटन और परिवहन जैसे क्षेत्रों को भी नई ऊर्जा देता है।

मेले से जुड़ी अर्थव्यवस्था

इस आयोजन के दौरान होटल, नाव चलाने वाले और ऑटो-टैक्सी चालकों की आमदनी में कई गुना की बढ़ोतरी देखी जाती है। साथ ही, फूल और खान-पान की छोटी-छोटी दुकानें लगाने वालों को भी बड़ा आर्थिक सहारा मिलता है। भागलपुर के एसडीएम और अर्थशास्त्र के छात्र रहे विकास कुमार ने IANS को बताया कि सावन के एक महीने की कमाई कई लोगों के लिए साल भर के खर्च का आधार बन जाती है। इस वर्ष मेले में 50 लाख से अधिक श्रद्धालुओं के आने का अनुमान लगाया गया है।

क्या कहते हैं स्थानीय लोग

पिछले 35 वर्षों से तीर्थ पुरोहित का काम कर रहे चुन्नू-मुन्नू उर्फ लाल मोहरिया पंडा ने एजेंसी को बताया कि मेले में देश-विदेश से कांवरियों के अलावा बड़ी संख्या में ब्राह्मण और पुजारी भी आते हैं। उन्होंने मेले के आर्थिक गणित को समझाते हुए कहा, "एक कांवरिया का गंगाधाम से बाबाधाम (देवघर) तक का खर्च करीब 6,000 से 7,000 रुपये आता है। महीने भर में करोड़ों लोग यहां आते हैं। आज दो घंटे में ही सवा से डेढ़ लाख लोग जल भरकर निकले हैं।"

लाल मोहरिया पंडा के अनुसार, उत्तर प्रदेश, बंगाल और नेपाल समेत सात-आठ राज्यों से लोग यहां सिर्फ कमाई के लिए आते हैं। हालांकि, उन्होंने इस बात पर चिंता भी जताई कि मेले में बिकने वाला अधिकांश सामान बंगाल, यूपी और दिल्ली जैसे राज्यों से आता है। उनका मानना है कि अगर सरकार स्थानीय स्तर पर इन उत्पादों के निर्माण को बढ़ावा दे, तो स्थानीय लोगों की आय और भी बढ़ सकती है।

इनपुट: IANS

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News4Social बिहार डेस्क

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