गुरूवार, 8 अक्टूबर 2026 · नई दिल्ली
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तिब्बत के पठार पर मील का पत्थर: आली क्षेत्र की पहली पवन ऊर्जा परियोजना ग्रिड से जुड़ने को तैयार

चीन के शीत्सांग (तिब्बत) स्वायत्त प्रदेश के ऊँचे पठारी इलाके में स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के अनुसार, आली क्षेत्र की पहली पवन ऊर्जा परियोजना…

तिब्बत के पठार पर मील का पत्थर: आली क्षेत्र की पहली पवन ऊर्जा परियोजना ग्रिड से जुड़ने को तैयार
(फोटो: IANS)

चीन के शीत्सांग (तिब्बत) स्वायत्त प्रदेश के ऊँचे पठारी इलाके में स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के अनुसार, आली क्षेत्र की पहली पवन ऊर्जा परियोजना में सभी टर्बाइनों की स्थापना का काम सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया है। इसके साथ ही, यह परियोजना अब ग्रिड से जुड़ने और परीक्षण के महत्वपूर्ण चरण में प्रवेश कर गई है।

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यह महत्वाकांक्षी परियोजना चाइना जनरल न्यूक्लियर पावर (सीजीएन) द्वारा विकसित की जा रही है, जिसका नाम 'आली गेत्से 50 मेगावाट पवन ऊर्जा परियोजना' है। इस परियोजना के 2026 के अंत तक पूरी तरह चालू होने और ग्रिड से जुड़ जाने की उम्मीद है।

कठिन परिस्थितियों में बड़ी उपलब्धि

यह परियोजना समुद्र तल से 4,600 से 4,800 मीटर की असाधारण ऊँचाई पर स्थित है, जहाँ हवा पतली, ऑक्सीजन की कमी और कड़ाके की ठंड जैसी गंभीर चुनौतियाँ हैं। सितंबर के मध्य से ही यहाँ तापमान शून्य डिग्री से नीचे चला जाता है। तेज हवाओं और ओलावृष्टि के कारण बड़े उपकरणों को लाने-ले जाने और टर्बाइनों को स्थापित करने का काम बेहद मुश्किल हो जाता है, जिससे काम के घंटे सीमित हो जाते हैं।

इन बाधाओं के बावजूद, परियोजना टीम ने लगातार हवा की गति पर नजर रखते हुए निर्माण योजना में बदलाव किए और सभी 10 पवन टर्बाइनों को सफलतापूर्वक स्थापित कर लिया। हर टरबाइन की क्षमता 5 मेगावाट है। चीनी राष्ट्रीय दिवस की छुट्टियों के दौरान भी 60 से अधिक कर्मचारी इस काम को पूरा करने के लिए मौके पर मौजूद रहे।

पर्यावरण और ऊर्जा सुरक्षा पर प्रभाव

फिलहाल, परियोजना में गुणवत्ता निरीक्षण और सबस्टेशन उपकरणों की जाँच का काम चल रहा है ताकि इसे जल्द से जल्द ग्रिड से जोड़ा जा सके। एक बार पूरी क्षमता से काम करने के बाद, इस संयंत्र से सालाना लगभग 18 करोड़ किलोवाट-घंटे बिजली का उत्पादन होने का अनुमान है। इससे न केवल इलाके में ऊर्जा की कमी को पूरा करने में मदद मिलेगी, बल्कि यह करीब 1.5 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को भी कम करेगा।

इनपुट: IANS

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