पंजाब: ओटीटी से हटी दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज', दोबारा रिलीज के लिए सड़क पर उतरे लोग
पंजाब में अभिनेता दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' को एक ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटाए जाने के बाद विरोध तेज हो गया है। यह फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित है, जो 3 जुलाई को रि
पंजाब में अभिनेता दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' को एक ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटाए जाने के बाद विरोध तेज हो गया है। यह फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित है, जो 3 जुलाई को रिलीज हुई थी लेकिन दो दिन बाद ही उसे प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया। अब इसे दोबारा रिलीज करने की मांग को लेकर विभिन्न सामाजिक संगठन, शिक्षक, छात्र और वकील प्रदर्शन कर रहे हैं। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, प्रदर्शनकारियों का मानना है कि यह सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि इतिहास, मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा एक गंभीर प्रश्न है।
क्यों हो रहा है विरोध?
विरोध में शामिल सामाजिक कार्यकर्ता मंजीत सिंह ने बताया कि लोग इस फिल्म का लंबे समय से इंतजार कर रहे थे। उन्होंने कहा, "पहले फिल्म पर बड़ी संख्या में कट लगाने की बात कही गई थी लेकिन अंततः यह 'सतलुज' नाम से रिलीज हुई।" उनके मुताबिक, अगर फिल्म किसी धर्म, समुदाय, कानून-व्यवस्था या राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा नहीं थी, तो उसे हटाने की जरूरत क्यों पड़ी। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि फिल्म पंजाब के इतिहास के एक महत्वपूर्ण दौर और मानवाधिकार से जुड़े मुद्दे को सामने लाती है, इसलिए इसे दोबारा ओटीटी और सिनेमाघरों में रिलीज किया जाना चाहिए ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग इसे देख सकें।
मंजीत सिंह ने जोर देकर कहा कि इस आंदोलन में किसी एक समुदाय के लोग शामिल नहीं हैं। उन्होंने बताया, "प्रदर्शन में प्रोफेसर, वकील, शिक्षक, छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता, हिंदू, मुस्लिम, सिख और गैर-पंजाबी नागरिक भी शामिल हैं। लोग सच को जानना चाहते हैं और इतिहास को छिपाने की कोशिश केवल असंतोष और आक्रोश को जन्म देती है।"
क्या था जसवंत सिंह खालड़ा का मामला?
इस विरोध प्रदर्शन में शामिल गुरदासपुर जिला अस्पताल के पूर्व प्रभारी डॉ. प्यारेलाल गर्ग ने IANS से बात करते हुए उस दौर को याद किया। उन्होंने बताया कि पंजाब में उग्रवाद के दौर में एक वरिष्ठ सर्जन के तौर पर उनके पास गोलीबारी और हिंसा से जुड़े कई पोस्टमार्टम के मामले आते थे। डॉ. गर्ग ने कहा, "मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा ने भी कथित तौर पर इसी तरह के दस्तावेजी और वैज्ञानिक तरीके से उन मामलों की पड़ताल की थी, जिनमें अज्ञात शवों के अंतिम संस्कार और कथित मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोप सामने आए थे।"
उन्होंने बताया कि खालड़ा ने श्मशान घाटों के रजिस्टर और सरकारी रिकॉर्ड जैसे दस्तावेजों का अध्ययन कर तथ्यों को उजागर किया था, जिसके बाद एक दिन उन्हें भी गायब कर दिया गया। डॉ. गर्ग का मानना है कि ऐसे ऐतिहासिक विषय पर बनी फिल्म को जनता के सामने आने देना चाहिए। उन्होंने कहा, "न्याय मिलने में समय लग सकता है लेकिन यदि किसी मामले को सही तरीके से लड़ा जाए तो अंततः न्याय संभव है।" उन्होंने यह भी कहा कि फिल्म को रोकना समाधान नहीं है और लोकतांत्रिक समाज में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को स्थान मिलना चाहिए।
इनपुट: IANS



