सड़क हादसे में लकवाग्रस्त तेंदुए को मिली नई ज़िंदगी, गांधीनगर में महीनों के इलाज के बाद फिर चलने लगा
गांधीनगर में डॉक्टरों की एक टीम ने सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल एक तेंदुए को नई जिंदगी दी है। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, अरवल्ली जिले में एक सड़क हादसे के बाद तेंदुए के पिछले दोनों पैर…
गांधीनगर में डॉक्टरों की एक टीम ने सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल एक तेंदुए को नई जिंदगी दी है। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, अरवल्ली जिले में एक सड़क हादसे के बाद तेंदुए के पिछले दोनों पैर लकवाग्रस्त हो गए थे, लेकिन महीनों के गहन उपचार और पुनर्वास के बाद अब वह फिर से चलने-फिरने में सक्षम है। इस सफल बचाव के लिए राज्य के वन एवं पर्यावरण मंत्री श्री अर्जुन मोढवाडिया ने ‘गीर’ फाउंडेशन की टीम को बधाई दी है।
यह घटना 19 जनवरी, 2026 की है, जब शामलाजी के पास खेराचा-खोडंबा हाईवे पर एक अज्ञात वाहन की चपेट में आने से तेंदुआ गंभीर रूप से घायल हो गया था। वन विभाग की टीम ने उसे बचाकर तुरंत इलाज शुरू करवाया, लेकिन उसकी हालत बेहद नाजुक थी।
गंभीर चोटें और लकवा
‘गीर’ फाउंडेशन के निदेशक बी.पी. पति (आईएफएस) ने बताया, “तेंदुए की स्थिति अत्यंत गंभीर थी। उसके पिछले दोनों पैर पूरी तरह से लकवाग्रस्त हो गए थे। वह खड़ा नहीं हो पा रहा था और अपने अगले पैरों की मदद से शरीर के पिछले हिस्से को घसीटते हुए आगे बढ़ता था।” उन्होंने आगे कहा कि तेंदुए के निचले जबड़े में भी गंभीर चोट थी, जिससे उसका निचला होंठ लटक गया था और मुंह में संक्रमण फैल गया था। इस वजह से शुरुआत में उसे खाना-पानी निगलने में भी भारी परेशानी हो रही थी।
20 जनवरी को मामला ‘गीर’ फाउंडेशन के पास आया। हिम्मतनगर के एक वेटरनरी क्लिनिकल कॉम्प्लेक्स में हुई रेडियोग्राफिक जांच में पता चला कि उसकी रीढ़ की हड्डी के L7-S1 हिस्से में गंभीर फ्रैक्चर था, जिसके कारण उसे लकवा मार गया था।
महीनों चला इलाज और रिकवरी
‘गीर’ फाउंडेशन के उप निदेशक (आईएफएस) अमित नायक के अनुसार, तेंदुए को गांधीनगर के इंद्रोड़ा नेचर पार्क लाया गया और उसके लिए एक विशेष पिंजरा तैयार किया गया। पशु चिकित्सकों की टीम ने गहन उपचार के साथ-साथ पोषण और सही शारीरिक मुद्रा बनाए रखने पर ध्यान दिया। इलाज का असर जल्द ही दिखने लगा।
सिर्फ तीन दिनों में तेंदुए ने खुद से खाना-पानी लेना शुरू कर दिया और पांचवें दिन वह सामान्य रूप से मल-मूत्र त्याग करने लगा। लगभग 40 दिनों के बाद वह अपने चारों पैरों पर खड़ा होने में कामयाब रहा और करीब दो महीने बाद उसने बाड़े में चलना शुरू कर दिया। ढाई महीने के भीतर उसने अपनी सामान्य चाल लगभग वापस पा ली थी।
अब जंगल में वापसी संभव नहीं
पूरी तरह ठीक होने के बावजूद, तेंदुए की शारीरिक मुद्रा में हल्का विचलन और पूंछ में लकवा के कुछ अवशिष्ट प्रभाव बाकी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इन कमजोरियों के साथ वह जंगल में शिकार नहीं कर पाएगा और खुद को खतरों से नहीं बचा सकेगा। इसी कारण उसे वापस जंगल में नहीं छोड़ने का फैसला किया गया है। फिलहाल, वह गांधीनगर के इंद्रोड़ा नेचर पार्क में ही रहेगा, जहां उसकी पूरी देखभाल की जाएगी।
इनपुट: IANS



