गुरूवार, 24 सितम्बर 2026 · नई दिल्ली
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ट्रिब्यूनल सुधार: राज्यसभा से विधेयक पारित, राष्ट्रीय अधिकरण आयोग बनाने का रास्ता साफ़

भारत में अधिकरणों (Tribunals) की व्यवस्था में बड़े बदलाव लाने के उद्देश्य से मंगलवार को राज्यसभा ने 'अधिकरण सुधार विधेयक, 2026' पारित कर दिया। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, इस विधेयक का सबसे अहम पहलू…

ट्रिब्यूनल सुधार: राज्यसभा से विधेयक पारित, राष्ट्रीय अधिकरण आयोग बनाने का रास्ता साफ़
(फोटो: IANS)

भारत में अधिकरणों (Tribunals) की व्यवस्था में बड़े बदलाव लाने के उद्देश्य से मंगलवार को राज्यसभा ने 'अधिकरण सुधार विधेयक, 2026' पारित कर दिया। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, इस विधेयक का सबसे अहम पहलू राष्ट्रीय अधिकरण आयोग की स्थापना करना है, जो इन न्यायिक संस्थाओं की नियुक्ति प्रक्रिया, सेवा शर्तों और कामकाज में पारदर्शिता व दक्षता सुनिश्चित करने के लिए एक स्वतंत्र संस्थागत ढांचा तैयार करेगा।

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केंद्रीय विधि एवं न्याय राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने सदन में विधेयक पेश करते हुए इसके प्रमुख प्रावधानों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि इस सुधार का लक्ष्य न्याय तक पहुंच को आसान बनाना, कारोबार सुगमता (Ease of Doing Business) को बढ़ावा देना और भारत के कानूनी ढांचे को वैश्विक मानकों के अनुरूप मजबूत करना है।

विधेयक के मुख्य प्रावधान और उद्देश्य

मंत्री अर्जुन राम मेघवाल के मुताबिक, विधेयक में अधिकरण के सदस्यों के लिए 5 वर्ष के कार्यकाल का प्रावधान किया गया है, जो निर्धारित ऊपरी आयु सीमा के अधीन होगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पात्रता के लिए कोई अलग न्यूनतम आयु सीमा नहीं रखी गई है। अध्यक्ष और सदस्यों के वेतन, भत्ते और सेवा की अन्य शर्तें नियमों के माध्यम से तय की जाएंगी। मेघवाल ने ज़ोर देकर कहा, “अधिकरण सदस्यों का कार्यकाल और स्पष्ट सेवा शर्तें न्यायिक स्वतंत्रता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।”

यह विधेयक अधिकरणों के मूल अधिकार क्षेत्र में कोई हस्तक्षेप नहीं करता है। मंत्री ने सदन को आश्वस्त किया कि यह केवल नियुक्तियों, संस्थागत स्वतंत्रता, पारदर्शिता और दक्षता को मजबूत करने पर केंद्रित है, न कि उनके अधिकार क्षेत्र को बदलने पर।

सुधार प्रक्रिया की पृष्ठभूमि

अर्जुन राम मेघवाल ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार ने 2015 में ही अधिकरणों के युक्तिकरण (rationalisation) की प्रक्रिया शुरू कर दी थी, क्योंकि उनके कामकाज में प्रक्रियागत और प्रशासनिक विविधताएं जैसी कई चुनौतियां सामने आ रही थीं। इसी क्रम में 2021 में एक अध्यादेश और फिर अधिनियम लाया गया, जिसके बाद अधिकरणों की संख्या 19 से घटाकर 16 कर दी गई।

उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि 2021 के कानून के कुछ प्रावधानों को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई थी। 19 नवंबर, 2025 को आए उच्चतम न्यायालय के एक फैसले में ही राष्ट्रीय अधिकरण आयोग जैसी संस्था की आवश्यकता को रेखांकित किया गया था। यह नया विधेयक उसी न्यायिक मार्गदर्शन को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।

राष्ट्रीय अधिकरण आयोग की संरचना

विधेयक में प्रस्तावित राष्ट्रीय अधिकरण आयोग की अध्यक्षता उच्चतम न्यायालय के किसी पूर्व न्यायाधीश या किसी उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश करेंगे। आयोग में दो न्यायिक सदस्य और दो तकनीकी सदस्य भी शामिल होंगे, ताकि न्यायिक और तकनीकी विशेषज्ञता के बीच सही संतुलन बनाया जा सके।

एक सांसद द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति में सामाजिक विविधता का मुद्दा उठाए जाने पर मेघवाल ने जवाब दिया कि सरकार कॉलिज्यम द्वारा अनुशंसित नियुक्तियों के अलावा, उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों को पत्र लिखकर अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ा वर्ग, महिलाओं और अल्पसंख्यकों से नाम भेजने का आग्रह करती है। उन्होंने कहा कि 'सबका साथ, सबका विकास' के मंत्र के तहत इन वर्गों का प्रतिनिधित्व विभिन्न उच्च न्यायालयों में बढ़ा है।

इनपुट: IANS

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News4Social राजनीति डेस्क

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