अब्दुल हमीद: 1965 युद्ध का वो महानायक जिसने पैटन टैंकों को मिट्टी में मिला दिया
1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में एक ऐसा भी योद्धा था, जिसने अपनी साधारण रिकॉइललेस गन से दुश्मन के अत्याधुनिक अमेरिकी पैटन टैंकों की कब्रगाह बना दी थी। यह कहानी है कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार (CQMH)…
1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में एक ऐसा भी योद्धा था, जिसने अपनी साधारण रिकॉइललेस गन से दुश्मन के अत्याधुनिक अमेरिकी पैटन टैंकों की कब्रगाह बना दी थी। यह कहानी है कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार (CQMH) अब्दुल हमीद की, जिनका नाम भारतीय सैन्य इतिहास में अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान के लिए स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, 10 सितंबर 1965 को उन्होंने देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए, लेकिन उनकी वीरता की गाथा आज भी हर भारतीय को प्रेरित करती है।
पंजाब के खेमकरण सेक्टर में हुई 'असल उत्तर' की प्रसिद्ध लड़ाई में अब्दुल हमीद ने अपनी जीप पर लगी आरसीएल गन से पाकिस्तानी टैंकों पर कहर बरपा दिया था। भारतीय सेना के अनुसार, उन्होंने एक के बाद एक सात से आठ दुश्मन टैंकों को नष्ट कर दिया, जिससे पाकिस्तानी आक्रमण की कमर टूट गई। यह एक ऐसी निर्णायक कार्रवाई थी जिसने युद्ध का रुख बदल दिया।
साधारण शुरुआत, असाधारण सैनिक
1 जुलाई 1933 को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के धामूपुर गाँव में जन्मे अब्दुल हमीद एक साधारण परिवार से थे। उनके पिता मोहम्मद उस्मान एक दर्जी थे और माँ का नाम सकीना बेगम था। बचपन से ही देशभक्ति और अनुशासन के गुणों से ओतप्रोत हमीद 27 दिसंबर 1954 को भारतीय सेना की ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट में शामिल हुए। बाद में उनकी तैनाती 4 ग्रेनेडियर्स बटालियन में हुई, जहाँ उन्होंने अपने सैन्य जीवन का अधिकांश समय बिताया।
वीरगति और सर्वोच्च सम्मान
10 सितंबर 1965 को, जब हमीद दुश्मन के टैंकों को निशाना बना रहे थे, तभी एक पाकिस्तानी टैंक का गोला सीधे उनकी जीप पर आ लगा। गंभीर रूप से घायल होने के बाद उन्होंने रणभूमि में ही वीरगति प्राप्त की। उनके इस असाधारण शौर्य और सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। 26 जनवरी 1966 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने यह सम्मान उनकी पत्नी रसूलन बीबी को प्रदान किया।
अब्दुल हमीद की शहादत ने भारतीय सैनिकों में एक नया जोश भर दिया, जिसके परिणामस्वरूप असल उत्तर की लड़ाई भारतीय सेना की सबसे बड़ी जीतों में से एक मानी जाती है। परमवीर चक्र के अलावा उन्हें समर सेवा पदक, रक्षा पदक और सैन्य सेवा पदक से भी सम्मानित किया गया था। उनका जीवन यह साबित करता है कि युद्ध केवल हथियारों से नहीं, बल्कि हौसले और रणनीति से जीते जाते हैं।
इनपुट: IANS



