सोमवार, 3 अगस्त 2026 · नई दिल्ली
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बलूचिस्तान में ताकत झोंकने के बावजूद क्यों बेबस दिख रही है पाकिस्तानी सेना?

पाकिस्तान इस वक्त कई आंतरिक और बाहरी मोर्चों पर चुनौतियों से जूझ रहा है। इनमें से बलूचिस्तान प्रांत पाकिस्तानी सेना के लिए एक ऐसी लगातार बड़ी होती चुनौती बन गया है, जहाँ भारी सैन्य तैनाती और खुफिया…

बलूचिस्तान में ताकत झोंकने के बावजूद क्यों बेबस दिख रही है पाकिस्तानी सेना?
(फोटो: IANS)

पाकिस्तान इस वक्त कई आंतरिक और बाहरी मोर्चों पर चुनौतियों से जूझ रहा है। इनमें से बलूचिस्तान प्रांत पाकिस्तानी सेना के लिए एक ऐसी लगातार बड़ी होती चुनौती बन गया है, जहाँ भारी सैन्य तैनाती और खुफिया तंत्र के बावजूद उसे विद्रोह को काबू करने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के मुताबिक, हाल के महीनों में बलूच लड़ाकों के हमलों में सुरक्षा बलों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है, जिससे प्रांत में सेना की कमजोरी उजागर हुई है।

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बलूचिस्तान के लोग पाकिस्तानी सरकार पर उनके प्राकृतिक संसाधनों का शोषण करने और इलाके को एक कॉलोनी की तरह इस्तेमाल करने का आरोप लगाते हैं। इसी वजह से स्थानीय आबादी का बड़ा हिस्सा गरीबी में जी रहा है और सरकार के खिलाफ गुस्से की भावना बहुत गहरी है। पाकिस्तान विरोधी यह भावना इतनी प्रबल है कि सेना के लिए बलूच लड़ाकों के बारे में स्थानीय लोगों से विश्वसनीय खुफिया जानकारी जुटाना लगभग असंभव हो गया है। सटीक जमीनी जानकारी के अभाव में कोई भी सैन्य अभियान सफल होना मुश्किल होता है।

सेना की बड़ी मौजूदगी, फिर भी पकड़ कमजोर

बलूचिस्तान में पाकिस्तान की लगभग सभी केंद्रीय और राजकीय सुरक्षा और इंटेलिजेंस एजेंसियों की मजबूत मौजूदगी है। थल सेना, वायु सेना, नौसेना और कोस्ट गार्ड समेत सेना की सभी शाखाएँ यहाँ तैनात हैं, जिनमें थल सेना की भूमिका सबसे अहम है। पश्चिमी बलूचिस्तान में ग्वादर का डीप-वॉटर पोर्ट एक प्रमुख सैन्य अड्डा है और कराची के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा बंदरगाह भी है। यहाँ कोस्ट गार्ड की तीसरी बटालियन भी तैनात है। इसके अलावा, पासनी, ओरमारा और जिवानी में तीन छोटे नौसैनिक अड्डे हैं। खुफिया एजेंसियों में, इंटर-सर्विस इंटेलिजेंस (आईएसआई) की क्वेटा में बड़ी मौजूदगी है।

विद्रोहियों के जवाब में नए ऑपरेशन

बलूच विद्रोहियों के हमलों के जवाब में पाकिस्तानी सेना ने हाल ही में कई बड़े ऑपरेशन शुरू किए हैं। 6 जुलाई को जियारत में मांगी डैम पंपिंग स्टेशन पर एक पुलिस पोस्ट पर हुए हमले के बाद सुरक्षा बलों ने 'ऑपरेशन शाबान' शुरू किया। इसी दौरान, पाकिस्तानी सेना ने प्रांत में 'ऑपरेशन अल-अज्म' भी चलाया। लेकिन इन कार्रवाइयों, जिनमें लोगों को जबरन गायब करने और न्यायेतर हत्याओं के आरोप भी शामिल हैं, के बावजूद बलूच लड़ाकों ने कड़ा मुकाबला किया है। उन्होंने मुश्किल हमलों को अंजाम देकर अपनी पहुंच और क्षमता का प्रदर्शन किया है।

इन घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि भारी संख्या में सेना की तैनाती के बावजूद, पाकिस्तानी सरकार बलूचिस्तान के बड़े हिस्सों पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए लगातार संघर्ष कर रही है। यह स्थिति पाकिस्तान के लिए एक नासूर बनती जा रही है, जिसका सामना वह अफगानिस्तान सीमा और पीओके जैसे अन्य मोर्चों पर भी कर रही है।

इनपुट: IANS

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News4Social इंटरनेशनल डेस्क

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