मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026 · नई दिल्ली
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नागालैंड: FCRA संशोधन बिल पर विधानसभा में उठी चिंता, चर्च और सामाजिक संस्थाओं पर असर की आशंका

नागालैंड विधानसभा में ‘विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026’ के प्रस्तावित प्रावधानों को लेकर गंभीर चिंता जताई गई है। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, विधायकों ने विधेयक पर और अधिक गहन जांच और…

नागालैंड: FCRA संशोधन बिल पर विधानसभा में उठी चिंता, चर्च और सामाजिक संस्थाओं पर असर की आशंका
(फोटो: IANS)

नागालैंड विधानसभा में ‘विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026’ के प्रस्तावित प्रावधानों को लेकर गंभीर चिंता जताई गई है। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, विधायकों ने विधेयक पर और अधिक गहन जांच और व्यापक विचार-विमर्श की मांग करते हुए आगाह किया है कि इसके सख्त नियम राज्य में शिक्षा, स्वास्थ्य और मानवीय सेवाएं दे रहे चर्च, चैरिटेबल संस्थाओं और नागरिक समाज संगठनों के कामकाज को प्रभावित कर सकते हैं।

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मंगलवार को सदन में यह मुद्दा तत्काल सार्वजनिक महत्व के मामले के तौर पर नियम 50 के तहत उठाया गया। सलाहकार अचंबेमो किकोन द्वारा लाए गए इस प्रस्ताव का सलाहकार टेमजेनमेनबा और विधायक वाई. मनखाओ कोन्याक ने समर्थन किया। विधायकों ने इस बात पर जोर दिया कि पारदर्शिता और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए विदेशी चंदे को विनियमित करना आवश्यक है, लेकिन नए नियम ऐसे नहीं होने चाहिए जिनसे सही संस्थानों के काम में रुकावट आए।

विधेयक के प्रावधानों पर मुख्य चिंताएं

चर्चा के दौरान सलाहकार अचंबेमो किकोन ने बताया कि प्रस्तावित संशोधनों से नागालैंड के ईसाई संगठनों में बेचैनी है। उन्होंने कहा कि कोहिमा के डायोसिस और नागालैंड बैपटिस्ट चर्च काउंसिल (NBCC) जैसे संगठनों को पहले से ही अपने FCRA रजिस्ट्रेशन के नवीनीकरण में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। किकोन के अनुसार, नई चिंताएं रजिस्ट्रेशन रद्द होने या खत्म होने के बाद संपत्ति के प्रबंधन और निपटान से जुड़े प्रावधानों को लेकर हैं। उन्होंने दशकों से स्थानीय और विदेशी चंदे से चल रही चर्च संस्थाओं का हवाला देते हुए संपत्ति से जुड़े नियमों पर फिर से सोचने की जरूरत बताई।

संवैधानिक सुरक्षा और व्यापक संवाद की मांग

विधायकों ने सरकार से अपील की कि वह प्रस्तावित प्रावधानों की समीक्षा संवैधानिक सुरक्षा उपायों और अनुच्छेद 371-ए के तहत नागालैंड को मिले विशेष दर्जे को ध्यान में रखकर करे। विधायक पी. लोंगोन ने इस मुद्दे को सिर्फ धार्मिक संगठनों तक सीमित न रखकर पूरे नागालैंड से जुड़ा मामला बताया। उन्होंने विधानसभा से आग्रह किया कि वह अपनी चिंताएं संयुक्त संसदीय समिति (JPC) तक पहुंचाए। सलाहकार कुदेचो खामो ने कहा कि कम प्रशासनिक क्षमता वाले छोटे चर्चों और जमीनी स्तर के संगठनों पर इन नियमों का बहुत ज्यादा बोझ पड़ सकता है।

सरकार का पक्ष और अब तक की कार्रवाई

बहस का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री नेफियू रियो ने सदन को बताया कि राज्य सरकार इस मुद्दे पर ईसाई संगठनों के प्रतिनिधियों से पहले ही बात कर चुकी है। उन्होंने जानकारी दी कि उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर नागालैंड की विशिष्ट सामाजिक-ऐतिहासिक परिस्थितियों का हवाला देते हुए ईसाई समुदाय की चिंताओं से अवगत कराया था।

मुख्यमंत्री के मुताबिक, इसके बाद केंद्र सरकार ने 12 अगस्त को यह विधेयक 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति को भेज दिया है, ताकि प्रस्तावित कानून से जुड़ी चिंताओं की जांच हो सके। रियो ने सदन को भरोसा दिलाया कि राज्य सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए सभी संबंधित पक्षों और केंद्र के साथ बातचीत जारी रखेगी कि नागालैंड की चिंताओं का उचित समाधान हो।

इनपुट: IANS

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News4Social नेशनल डेस्क

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