जापान का बड़ा मंगल मिशन: चांद 'फोबोस' की मिट्टी से खुलेंगे सौरमंडल के कई गहरे राज़
सौरमंडल की शुरुआत कैसे हुई और पृथ्वी पर जीवन के लिए ज़रूरी चीज़ें कहाँ से आईं? इन बड़े सवालों के जवाब मंगल ग्रह के एक छोटे से चांद की मिट्टी में छिपे हो सकते हैं। इसी रहस्य से पर्दा उठाने के लिए…
सौरमंडल की शुरुआत कैसे हुई और पृथ्वी पर जीवन के लिए ज़रूरी चीज़ें कहाँ से आईं? इन बड़े सवालों के जवाब मंगल ग्रह के एक छोटे से चांद की मिट्टी में छिपे हो सकते हैं। इसी रहस्य से पर्दा उठाने के लिए जापान ने एक ऐतिहासिक अंतरिक्ष मिशन लॉन्च किया है, जिसका लक्ष्य मंगल के चंद्रमा 'फोबोस' से चट्टान और धूल के नमूने इकट्ठा करके पृथ्वी पर लाना है। समाचार एजेंसी IANS के मुताबिक, यह अपनी तरह का पहला अभियान है जिसमें किसी दूसरे ग्रह के चंद्रमा से सैंपल वापस लाए जाएँगे।
जापान की एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी (JAXA) ने मंगलवार को अपने H-3 रॉकेट से 'मार्टियन मून्स एक्सप्लोरेशन' (MMX) अंतरिक्ष यान को सफलतापूर्वक रवाना किया। जापान के दक्षिण-पश्चिम में स्थित तनेगाशिमा अंतरिक्ष केंद्र से स्थानीय समयानुसार सुबह 4 बजकर 41 मिनट पर यह प्रक्षेपण हुआ। JAXA ने करीब एक घंटे बाद पुष्टि की कि अंतरिक्ष यान रॉकेट से सुरक्षित अलग हो गया है।
मिशन का मकसद और वैज्ञानिक पहेली
मंगल के दो अजीबोगरीब चंद्रमा हैं- फोबोस और डिमोस। वैज्ञानिक आज तक यह पक्के तौर पर नहीं जानते कि वे कैसे बने। एक थ्योरी कहती है कि वे मंगल से किसी बड़ी टक्कर के बाद निकले मलबे से बने हैं, जबकि दूसरी मानती है कि वे दरअसल बाहरी क्षुद्रग्रह (asteroids) हैं जिन्हें मंगल के गुरुत्वाकर्षण ने पकड़ लिया।
फोबोस की मिट्टी के विश्लेषण से इस गुत्थी को सुलझाने में मदद मिलेगी। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इन नमूनों में मंगल ग्रह की सतह की सामग्री भी मिल सकती है, जिससे लाल ग्रह के इतिहास को समझने में आसानी होगी। इस महत्वाकांक्षी मिशन की लागत करीब 57.8 करोड़ डॉलर है और इसका लक्ष्य सिर्फ 10 ग्राम नमूने जुटाना है, जो 2031 तक पृथ्वी पर वापस पहुँचेंगे।
चुनौतियों भरा लंबा सफर
लगभग पाँच टन वज़नी MMX अंतरिक्ष यान अगस्त 2027 में मंगल के पास पहुँचेगा। इसके बाद यह फोबोस की परिक्रमा करते हुए उसकी सतह और गुरुत्वाकर्षण का अध्ययन करेगा। इस मिशन में फ्रांस और जर्मनी के सहयोग से बना 'इडेफिक्स' नाम का एक छोटा रोवर भी शामिल है। यह रोवर फोबोस पर उतरकर करीब 100 दिनों तक सर्वेक्षण करेगा और मुख्य यान के उतरने के लिए सुरक्षित जगह तलाशेगा।
तकनीकी चुनौती: फोबोस पर गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी के मुकाबले न के बराबर है। इसलिए, लैंडर और रोवर का सतह पर उतरना और बिना उछले नमूने इकट्ठा करना एक बड़ी इंजीनियरिंग चुनौती है। मुख्य लैंडर वहाँ सिर्फ दो घंटे के लिए उतरेगा। अपना काम पूरा करने के बाद यह वापसी की यात्रा शुरू करेगा और रास्ते में मंगल के दूसरे चंद्रमा डिमोस का भी अध्ययन करेगा। इस अभियान में नासा और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसियां भी सहयोग कर रही हैं।
इनपुट: IANS



