कारगिल युद्ध: जब कैप्टन अनुज नैय्यर ने 9 दुश्मनों को मार गिराया, जानिए 24 साल के इस महावीर की शौर्य गाथा
24 साल की उम्र में देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले कैप्टन अनुज नैय्यर की शौर्य गाथा भारतीय सैन्य इतिहास के सुनहरे पन्नों में दर्ज है। कारगिल युद्ध के इस नायक ने अपनी असाधारण वीरता से न सिर्फ…
24 साल की उम्र में देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले कैप्टन अनुज नैय्यर की शौर्य गाथा भारतीय सैन्य इतिहास के सुनहरे पन्नों में दर्ज है। कारगिल युद्ध के इस नायक ने अपनी असाधारण वीरता से न सिर्फ दुश्मन के मंसूबों को नाकाम किया, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का एक स्रोत बन गए। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, 28 अगस्त को उनकी जयंती मनाई जाती है, जो उनके अदम्य साहस और दृढ़ संकल्प को याद करने का एक अवसर है।
दिल्ली में 28 अगस्त 1975 को जन्मे अनुज नैय्यर के पिता एसके नैय्यर एक प्रोफेसर और मां मीना नैय्यर दिल्ली विश्वविद्यालय में लाइब्रेरियन थीं। बचपन से ही उनमें सेना के प्रति गहरा लगाव था, जिसकी प्रेरणा शायद उन्हें अपने फौजी दादा से मिली। उनका असाधारण साहस बचपन की एक घटना से ही ज़ाहिर हो गया था, जब एक दुर्घटना के बाद इलाज के दौरान उन्होंने बिना बेहोशी की दवा (एनेस्थीसिया) के 22 टांके लगवा लिए थे, जिसे देखकर डॉक्टर भी चकित रह गए थे।
सेना में चयन और कारगिल का मोर्चा
बचपन का जुनून उन्हें राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) तक ले गया, जहाँ वे 1993 में अपने पहले ही प्रयास में चयनित हो गए। भारतीय सैन्य अकादमी (आईएमए), देहरादून में प्रशिक्षण पूरा करने के बाद, 7 जून 1997 को उन्हें 17वीं जाट रेजिमेंट में कमीशन मिला। सेना में सेवा के महज़ दो साल बाद ही उन्हें कारगिल युद्ध के मोर्चे पर जाने का मौका मिला, जहाँ वे 17 जाट रेजिमेंट की चार्ली कंपनी का नेतृत्व कर रहे थे।
पॉइंट 4875 पर अदम्य वीरता
उनकी टुकड़ी को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण पॉइंट 4875 को पाकिस्तानी घुसपैठियों से मुक्त कराने का मुश्किल काम सौंपा गया था। 6 जुलाई 1999 को अभियान के दौरान कंपनी कमांडर के घायल होने के बाद कैप्टन अनुज नैय्यर ने कमान संभाली। उन्होंने अपनी टीम का नेतृत्व करते हुए दुश्मन की भारी गोलीबारी का सामना किया और नौ पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया। उन्होंने एक मशीनगन बंकर को भी नष्ट कर दिया। लेकिन जब जीत बस कुछ ही कदम दूर थी, 7 जुलाई 1999 को दुश्मन के एक ग्रेनेड हमले में वे वीरगति को प्राप्त हुए।
अधूरी रह गई एक प्रेम कहानी
कैप्टन नैय्यर की शहादत के पीछे उनकी निजी जिंदगी का एक मार्मिक पहलू भी है। युद्ध पर जाने से पहले उन्होंने अपनी अंगूठी एक वरिष्ठ अधिकारी को देते हुए कहा था कि यदि वे वापस न लौटें तो इसे उनकी मंगेतर सिमरन तक पहुंचा दिया जाए। दुर्भाग्य से, वह कभी वापस नहीं लौटे। उनके अद्वितीय साहस, नेतृत्व और बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत के दूसरे सर्वोच्च सैन्य सम्मान 'महावीर चक्र' से अलंकृत किया गया।
इनपुट: IANS



