कोरियाई प्रायद्वीप पर कूटनीतिक हलचल तेज़: ट्रंप-किम की संभावित बैठक और चीन की 'रचनात्मक भूमिका'
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग-उन से इस साल मुलाकात करने की घोषणा के साथ ही कोरियाई प्रायद्वीप एक बार फिर वैश्विक शक्तियों के कूटनीतिक मंच का केंद्र बन गया है। इस…
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग-उन से इस साल मुलाकात करने की घोषणा के साथ ही कोरियाई प्रायद्वीप एक बार फिर वैश्विक शक्तियों के कूटनीतिक मंच का केंद्र बन गया है। इस घोषणा के लगभग समानांतर ही चीन के विदेश मंत्री ने सोल का दौरा कर शांति प्रक्रिया में बीजिंग की महत्वपूर्ण भूमिका पर जोर दिया है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के अनुसार, ये दोनों घटनाक्रम महज संयोग नहीं हैं, बल्कि इस क्षेत्र को लेकर अमेरिका और चीन की अलग-अलग रणनीतिक प्राथमिकताओं को दर्शाते हैं।
बुधवार को व्हाइट हाउस में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने कहा, "मेरे रिश्ते किम के साथ बहुत अच्छे हैं।" उन्होंने यह भी संकेत दिया कि वह इस साल किम से मिलेंगे। इससे पहले उनके राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान 2018 और 2019 में दोनों नेताओं के बीच तीन मुलाकातें हुई थीं, लेकिन उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम पर कोई ठोस समझौता नहीं हो सका था।
परमाणु क्षमता और नई जटिलताएँ
इस बार की संभावित बातचीत पहले से कहीं ज़्यादा जटिल हो सकती है। ट्रंप के अनुसार, उत्तर कोरिया के पास 57 "बहुत शक्तिशाली" परमाणु हथियार हैं। वहीं, दक्षिण कोरिया के रक्षा मंत्री आन ग्यू-बैक ने गुरुवार को संसद में यह संख्या 80 से 120 के बीच होने का अनुमान लगाया। यह आकलन का अंतर दिखाता है कि उत्तर कोरिया अब केवल एक परमाणु कार्यक्रम विकसित करने वाला देश नहीं, बल्कि अपनी सुरक्षा के लिए इन हथियारों को অপরিহার্য मानने वाला राष्ट्र बन चुका है।
चीन का दृष्टिकोण और रणनीतिक हित
कोरियाई प्रायद्वीप पर किसी भी बड़े बदलाव का सीधा असर चीन की सुरक्षा पर पड़ता है। योनहाप के हवाले से, चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने सोल में अपने दक्षिण कोरियाई समकक्ष चो ह्यून से मुलाकात में कहा, "चीन शांति और स्थिरता को बढ़ावा देने में रचनात्मक भूमिका निभाता रहेगा।" बीजिंग की मुख्य चिंता किसी ऐसे घटनाक्रम को रोकना है जिससे उसके पड़ोस में अमेरिकी सैन्य प्रभाव और बढ़ जाए। वह अपनी सीमा पर किसी भी तरह का परमाणु संकट, युद्ध या अस्थिरता नहीं चाहता।
कूटनीतिक संतुलन और दक्षिण कोरिया
इस पूरी कूटनीतिक खींचतान में दक्षिण कोरिया की स्थिति सबसे संवेदनशील है। उसकी सुरक्षा अमेरिकी सैन्य गठबंधन पर निर्भर है, तो वहीं चीन उसका सबसे बड़ा आर्थिक साझेदार है। दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति ली जे-म्युंग ने 1950-53 के कोरियाई युद्ध को औपचारिक रूप से समाप्त करने के लिए बहुपक्षीय बातचीत का प्रस्ताव भी रखा है। यह युद्ध एक युद्धविराम के साथ रुका था, लेकिन तकनीकी रूप से दोनों कोरियाई देश आज भी युद्ध की स्थिति में हैं। ऐसे में, ट्रंप-किम की सीधी बातचीत सियोल के लिए एक अवसर भी है और एक चुनौती भी।
आगामी घटनाक्रम न केवल उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम का भविष्य तय करेंगे, बल्कि यह भी दिखाएंगे कि अमेरिका पूर्वी एशिया में अपनी सैन्य भूमिका को कैसे देखता है, चीन इस प्रक्रिया पर कितना प्रभाव डाल पाता है, और दक्षिण कोरिया अपनी सुरक्षा और कूटनीतिक स्वतंत्रता के बीच कैसे संतुलन साधता है।
इनपुट: IANS



