गुरूवार, 20 अगस्त 2026 · नई दिल्ली
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ईरान पर अमेरिकी 'आर्थिक डी-डे': चीन समेत कई देशों पर बढ़ सकता है दबाव

ईरान के साथ करीब छह महीने से चल रहे तनाव के बीच अमेरिका अब सैन्य दबाव के साथ-साथ एक बड़े आर्थिक अभियान की तैयारी में है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे…

ईरान पर अमेरिकी 'आर्थिक डी-डे': चीन समेत कई देशों पर बढ़ सकता है दबाव
(फोटो: IANS)

ईरान के साथ करीब छह महीने से चल रहे तनाव के बीच अमेरिका अब सैन्य दबाव के साथ-साथ एक बड़े आर्थिक अभियान की तैयारी में है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे 'इकोनॉमिक डी-डे' करार दिया है। इसके तहत ईरान के साथ व्यापार या वित्तीय संबंध रखने वाले देशों और कंपनियों को गंभीर आर्थिक परिणामों की चेतावनी दी गई है, जिसका मकसद तेहरान को पूरी तरह अलग-थलग करना है।

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अमेरिका के इस 'ऑपरेशन इकोनॉमिक फ्यूरी' का मुख्य निशाना ईरान के तेल निर्यात, वित्तीय लेनदेन और आय के अन्य स्रोतों को बंद करना है। इस रणनीति का सबसे ज्यादा असर चीन पर पड़ सकता है, जो न केवल ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, बल्कि उसके तेल का सबसे बड़ा खरीदार भी है।

चीन और अन्य व्यापारिक साझेदार निशाने पर

अमेरिकी राष्ट्रपति की ताजा चेतावनी से यह संकेत मिल रहे हैं कि वाशिंगटन उन चीनी कंपनियों, बैंकों या शिपिंग नेटवर्कों पर लगे प्रतिबंधों का दायरा और बढ़ा सकता है जो ईरानी तेल खरीदते हैं। अमेरिका पहले भी चीन की कुछ रिफाइनरी और शिपिंग कंपनियों पर ऐसे प्रतिबंध लगा चुका है। यह कदम अमेरिका और चीन के रिश्तों को और संवेदनशील बना सकता है।

हालांकि, इस सूची में सिर्फ चीन ही नहीं है। युद्ध शुरू होने से पहले भारत, तुर्की, जर्मनी, दक्षिण कोरिया और जापान भी ईरान के प्रमुख कारोबारी साझेदारों में शामिल थे। इन देशों पर भी अमेरिका का दबाव बढ़ सकता है।

भारत के लिए क्या हैं मायने?

यह स्थिति भारत के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि नई दिल्ली और तेहरान के बीच ऊर्जा, व्यापार और रणनीतिक संबंधों का एक लंबा इतिहास रहा है। फिलहाल यह साफ नहीं है कि भारत पर अमेरिकी कार्रवाई होगी या नहीं। इसका असर इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिका 'ईरान की मदद' को किस तरह परिभाषित करता है।

इस बीच, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने पहले ही ईरान के साथ व्यापार और वित्तीय लेनदेन रोक दिया है, जिससे तेहरान का एक अहम कारोबारी रास्ता कमजोर पड़ गया है। अमेरिका के अभियान का एक बड़ा लक्ष्य ईरान के तेल निर्यात को पूरी तरह ठप करना है, जिससे होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में पहले से ही अनिश्चितता बनी हुई है।

इनपुट: IANS

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