मंगलवार, 8 सितम्बर 2026 · नई दिल्ली
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गुवा गोलीकांड के 46 साल: जब झारखंड की धरती 11 आदिवासियों के खून से हुई थी लाल

झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिले का गुवा कस्बा हर साल 8 सितंबर को इतिहास के एक रक्तरंजित पन्ने को फिर से याद करता है। आज से 46 साल पहले, 1980 में इसी दिन, जल-जंगल-ज़मीन पर अपने अधिकारों की मांग कर रहे…

गुवा गोलीकांड के 46 साल: जब झारखंड की धरती 11 आदिवासियों के खून से हुई थी लाल
(फोटो: IANS)

झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिले का गुवा कस्बा हर साल 8 सितंबर को इतिहास के एक रक्तरंजित पन्ने को फिर से याद करता है। आज से 46 साल पहले, 1980 में इसी दिन, जल-जंगल-ज़मीन पर अपने अधिकारों की मांग कर रहे आदिवासियों पर पुलिस ने गोलियां बरसाई थीं। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस घटना में कुल 11 आदिवासी प्रदर्शनकारियों की जान चली गई थी, जिसकी भयावह स्मृति आज भी इस क्षेत्र के सामूहिक मानस में जीवित है।

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यह घटना स्वतंत्र भारत के इतिहास के उन काले अध्यायों में से एक है, जहां प्रशासन की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठे। उस दिन गुवा की लौह अयस्क से सनी लाल मिट्टी 11 आदिवासियों के खून से लाल हो गई थी।

क्या था 1980 का पूरा घटनाक्रम?

1970 और 80 के दशक में तत्कालीन बिहार का कोल्हान क्षेत्र कई वजहों से सुलग रहा था। वन विभाग द्वारा जंगल कटाई के नाम पर आदिवासियों पर मुकदमे दर्ज किए जा रहे थे और इस्को (IISCO) की स्थानीय खदानों में रोजगार के अधिकार को लेकर भी भारी असंतोष था। इसी पृष्ठभूमि में, 8 सितंबर 1980 को गुवा में एक विशाल जनसभा का आयोजन किया गया था।

प्रशासन ने धारा 144 लगाकर सभा को रोकने की कोशिश की, ट्रेनें और बसें भी रोक दी गईं। इसके बावजूद, हजारों आदिवासी मीलों पैदल चलकर पारंपरिक तीर-धनुष के साथ गुवा बाजार में जमा हुए। वे जेल में बंद लोगों की रिहाई, खदानों से निकलने वाले लाल पानी को नदियों में छोड़े जाने पर रोक और अपने अधिकारों की मांग कर रहे थे।

बाजार से अस्पताल तक फैली हिंसा

आंदोलन के दौरान माहौल तनावपूर्ण हो गया और प्रदर्शनकारियों की पुलिस से सीधी झड़प हो गई। पुलिस ने गोलियां चलाईं, जबकि प्रदर्शनकारियों की ओर से तीर चले। इस शुरुआती हिंसा में बिहार मिलिट्री पुलिस के चार जवान और दो आदिवासी मारे गए।

इसके बाद की घटना और भी भयावह थी। कई घायल आदिवासियों को इलाज के लिए गुवा अस्पताल ले जाया गया, जहां उनके हथियार बाहर ही रखवा लिए गए थे। आरोप है कि बिहार मिलिट्री पुलिस के जवान अस्पताल में दाखिल हुए और वहां मौजूद निहत्थे व घायल आदिवासियों को बाहर निकालकर गोलियों से भून दिया। विभिन्न स्वतंत्र जांच रिपोर्टों के मुताबिक, इस गोलीबारी में आठ और आदिवासियों की मौत हुई।

घटना की गूंज और परिणाम

इस गोलीकांड ने पूरे देश को झकझोर दिया और इसकी गूंज पटना से लेकर दिल्ली तक सुनाई दी। संसद में भी यह मामला उठा। पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) ने 1981 की अपनी रिपोर्ट में अस्पताल परिसर में आठ आदिवासियों को गोली मारने की पुष्टि की। तत्कालीन सांसद एके राय ने भी इस पर एक विस्तृत रिपोर्ट केंद्र को सौंपी थी।

हालांकि, सरकारी जांच के निष्कर्ष कभी पूरी तरह सार्वजनिक नहीं हुए। इस घटना ने झारखंड को एक अलग राज्य बनाने के आंदोलन को नई ऊर्जा दी और इसे आदिवासियों की अस्मिता का सवाल बना दिया। आज, गुवा में बने शहीद स्मारक पर लोग हर साल उन 11 शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

इनपुट: IANS

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News4Social नेशनल डेस्क

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