अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता: विदेश मंत्री जयशंकर ने 'गोल्डीलॉक्स' संतुलन और भारत जैसे देशों की भूमिका पर प्रकाश डाला
वैश्विक मंच पर अमेरिका और चीन के बीच चल रही प्रतिद्वंद्विता को लेकर भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने एक संतुलित रिश्ते की वकालत की है। उन्होंने इस स्थिति को 'गोल्डीलॉक्स' का नाम देते हुए कहा कि…
वैश्विक मंच पर अमेरिका और चीन के बीच चल रही प्रतिद्वंद्विता को लेकर भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने एक संतुलित रिश्ते की वकालत की है। उन्होंने इस स्थिति को 'गोल्डीलॉक्स' का नाम देते हुए कहा कि दोनों महाशक्तियों के बीच न तो बहुत ज़्यादा तनाव होना चाहिए और न ही बहुत ज़्यादा दोस्ती। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, रविवार को म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में बोलते हुए उन्होंने यह विचार व्यक्त किया।
डॉ. जयशंकर ने इस जटिल भू-राजनीतिक परिदृश्य में उभरती और मध्यम शक्तियों की भूमिका पर एक अहम सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि आज के दौर में ज़्यादातर देश सिर्फ़ अर्थव्यवस्था या सुरक्षा तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि वे सप्लाई चेन को मज़बूत करने जैसे विभिन्न मोर्चों पर अपने हितों को सुरक्षित करने में जुटे हैं।
नई विश्व व्यवस्था और भारत की रणनीति
विदेश मंत्री के अनुसार, जोखिमों को कम करने और नए विकल्प तलाशने की यही कोशिश धीरे-धीरे एक नई विश्व व्यवस्था को जन्म दे रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह उम्मीद करना यथार्थवादी नहीं है कि सभी देशों की सोच या हित पूरी तरह से एक जैसे हों। उनके मुताबिक, अगर कुछ मुद्दों पर भी सहमति बन जाती है, तो यह साथ मिलकर काम करने के लिए पर्याप्त है।
उन्होंने कहा, "अब सवाल ये है कि कौन किसके साथ हाथ मिलाता है। अगर उभरती और मध्यम ताकतों के बीच सीधा टकराव न हो तो वे आपस में सहयोग बढ़ाना चाहेंगी। साथ ही, यह भी स्वाभाविक है कि वे अमेरिका के साथ और चीन के साथ भी मिलकर काम करेंगी।"
बहु-संरेखण का बढ़ता चलन
डॉ. जयशंकर ने 'तीसरे रास्ते' के बढ़ते महत्व पर ज़ोर दिया, जो अब कोई अपवाद नहीं, बल्कि एक आम चलन बनता जा रहा है। उन्होंने कहा कि जो देश पहले किसी एक खेमे में सुरक्षित महसूस करते थे, वे भी अब तीसरे विकल्प पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं। उनके मुताबिक, आज की परस्पर जुड़ी दुनिया में पूरी तरह अलग-थलग रहना संभव नहीं है, इसलिए असली चुनौती अपने हितों को साधते हुए विकल्प खुले रखने की है।
उन्होंने भविष्य की विदेश नीति को 'बहु-संरेखण' (multi-alignment) के रूप में परिभाषित किया, जहाँ देशों को उन ताकतों से भी संबंध रखने होंगे जिनसे तालमेल बिठाना आसान नहीं है। विदेश मंत्री ने इसे 'बचाव के साथ आगे बढ़ने की रणनीति' बताया और कहा कि यह देखना होगा कि इसका संयुक्त राष्ट्र जैसे बहुपक्षीय मंचों पर क्या असर पड़ता है, जो पहले से ही गतिरोध का सामना कर रहे हैं।
इनपुट: IANS



