गुरूवार, 23 जुलाई 2026 · नई दिल्ली
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विक्रम-1 की उड़ान: भारत के निजी स्पेस सेक्टर ने पकड़ी रफ़्तार, वैश्विक बाजार पर नज़र

भारत के पहले निजी ऑर्बिटल रॉकेट 'विक्रम-1' की सफल उड़ान ने देश के अंतरिक्ष क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत की है। यह सफलता केवल एक लॉन्च नहीं, बल्कि सरकारी एकाधिकार से आगे बढ़कर एक बहुआयामी स्पेस…

विक्रम-1 की उड़ान: भारत के निजी स्पेस सेक्टर ने पकड़ी रफ़्तार, वैश्विक बाजार पर नज़र
(फोटो: IANS)

भारत के पहले निजी ऑर्बिटल रॉकेट 'विक्रम-1' की सफल उड़ान ने देश के अंतरिक्ष क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत की है। यह सफलता केवल एक लॉन्च नहीं, बल्कि सरकारी एकाधिकार से आगे बढ़कर एक बहुआयामी स्पेस इकोसिस्टम बनाने का स्पष्ट संकेत है, जहाँ निजी कंपनियाँ भी अहम भूमिका निभा रही हैं। समाचार एजेंसी IANS के हवाले से आई एक नई रिपोर्ट के अनुसार, यह मिशन साबित करता है कि भारत अब सिर्फ़ इसरो के किफ़ायती मिशनों तक सीमित नहीं है, बल्कि रॉकेट, सैटेलाइट और भविष्य में मानव मिशनों के लिए भी एक मज़बूत ज़मीन तैयार कर रहा है।

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यह उपलब्धि चंद्रयान-3 और आदित्य-L1 जैसे राष्ट्रीय मिशनों की सफलता की कहानी को आगे बढ़ाती है। 'इंडिया नैरेटिव' की रिपोर्ट में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि 2020 के आसपास शुरू हुए नीतिगत सुधारों और भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र (IN-SPACe) के गठन ने इस कामयाबी में बड़ी भूमिका निभाई।

निजी कंपनियों के लिए खुला आसमान

हैदराबाद स्थित स्टार्टअप स्काईरूट एयरोस्पेस द्वारा विकसित विक्रम-1 मिशन में कई आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया गया। इनमें रॉकेट के लिए पूरी तरह कार्बन कम्पोजिट से बनी मोटर केसिंग, उच्च-प्रदर्शन वाले सॉलिड मोटर और 3डी-प्रिंटेड पुर्जे शामिल हैं। कुछ समय पहले तक ये उन्नत निर्माण तकनीकें केवल इसरो और दुनिया की कुछ गिनी-चुनी बड़ी एयरोस्पेस कंपनियों के पास ही थीं।

IN-SPACe ने इस सफ़र में स्काईरूट को अपना हार्डवेयर परीक्षण करने और श्रीहरिकोटा में इसरो की लॉन्चिंग रेंज का उपयोग करने में मदद की। यह संस्था निजी रॉकेट निर्माताओं, सैटेलाइट बनाने वालों और अन्य सेवा प्रदाताओं को एक राष्ट्रीय पारिस्थितिकी तंत्र में जोड़ने का काम करती है।

बढ़ता निवेश और भविष्य की महत्वाकांक्षाएँ

विक्रम-1 की सफलता का एक और प्रमाण इसके पेलोड से मिलता है। इसमें भारत की ग्रहा स्पेस और कॉस्मोसर्व के अलावा जर्मनी की डीक्यूबेड जैसी अंतरराष्ट्रीय कंपनी का पेलोड भी शामिल था। यह दिखाता है कि भारत की निजी लॉन्च क्षमता पर वैश्विक ग्राहकों का भी भरोसा बढ़ रहा है।

नीतिगत सुधारों का असर ज़मीनी स्तर पर भी दिख रहा है। 2022 में जहाँ देश में केवल एक स्पेस स्टार्टअप था, वहीं 2024 तक इनकी संख्या बढ़कर लगभग 200 हो गई। रिपोर्ट के मुताबिक, इस सेक्टर ने 2023 के शुरुआती आठ महीनों में ही करीब 1,000 करोड़ रुपए का निवेश आकर्षित किया। अब नीति निर्माताओं का लक्ष्य 2030 तक वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी को मौजूदा 2% से बढ़ाकर 8% और 2047 तक 15% करना है। विक्रम-1 यह साबित करता है कि इस लक्ष्य को पाने के लिए ज़रूरी औद्योगिक आधार अब हकीकत में मौजूद है।

इनपुट: IANS

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